हर पिता टीनएजर बच्चे से कभी न कहें ये 3 बातें, वरना रिश्ता हो सकता है कमजोर

टीनएज बच्चों के जीवन का ऐसा चरण होता है, जब वे शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक बदलावों से गुजर रहे होते हैं। इस समय उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत होती है कि घर में उनकी बात सुनी जाए और उन्हें समझा जाए। लेकिन कई बार गुस्से या जल्दबाजी में पिता कुछ ऐसे शब्द बोल देते हैं, जो बच्चे के मन पर गहरी छाप छोड़ देते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे शब्द बच्चे को यह महसूस करा सकते हैं कि उसकी भावनाओं और परेशानियों की कोई अहमियत नहीं है। नतीजा यह होता है कि वह धीरे-धीरे अपनी बातें घर में साझा करना कम कर देता है।

1. ‘हमारे जमाने में तो…’

यह वाक्य लगभग हर घर में सुनने को मिल जाता है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह तुलना बच्चे को आपकी बात से जोड़ने के बजाय आपसे दूर कर सकती है।

जब बार-बार पुराने समय की तुलना की जाती है, तो टीनएजर को लगता है कि उसकी मौजूदा चुनौतियों को कोई समझ ही नहीं रहा।

इसके बजाय कहें:

“मैं समझता हूं कि आज का समय हमारे समय से अलग है। अगर तुम चाहो तो मुझे अपनी परेशानी समझा सकते हो।”

इस तरह की बात बच्चे को खुलकर अपनी भावनाएं साझा करने का भरोसा देती है।

2. ‘तुम्हें किस बात का स्ट्रेस है? सब कुछ तो दिया है’

कई माता-पिता अनजाने में यह बात कह देते हैं। लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक इससे बच्चे को यह महसूस हो सकता है कि उसकी भावनाएं और मानसिक दबाव महत्वपूर्ण नहीं हैं।

ऐसा सुनने के बाद बच्चा अपनी परेशानियां छिपाना शुरू कर सकता है और अकेले ही तनाव झेलने लगता है।

इसके बजाय कहें:

“मैं देख रहा हूं कि तुम परेशान हो। अगर बात करना चाहो तो मैं तुम्हारे साथ हूं।”

यह एक छोटा-सा वाक्य बच्चे के मन में सुरक्षा और विश्वास की भावना पैदा करता है।

3. ‘तुमसे कुछ नहीं होगा’

गुस्से में बोले गए ये शब्द बच्चे के आत्मविश्वास को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा सकते हैं। बार-बार ऐसी बातें सुनने वाला बच्चा खुद पर भरोसा खोने लगता है और असफलता का डर उसके मन में बैठ सकता है।

इसके बजाय कहें:

“गलतियां सबसे होती हैं। कोशिश करते रहो, मैं तुम्हारे साथ हूं।”

ऐसे शब्द बच्चे को आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं और उसके आत्मविश्वास को मजबूत बनाते हैं।

बच्चे को सुनना भी उतना ही जरूरी है

विशेषज्ञों का मानना है कि हर समस्या का समाधान सलाह देना नहीं होता। कई बार बच्चों को सिर्फ इतना चाहिए होता है कि कोई बिना टोके उनकी पूरी बात सुन ले। जब माता-पिता उनकी भावनाओं को समझने की कोशिश करते हैं, तो आपसी विश्वास मजबूत होता है और रिश्ते में दूरी आने की संभावना कम हो जाती है।

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