रूस निर्मित S-400 एयर डिफेंस सिस्टम को लेकर तुर्की की रणनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अंकारा इस सिस्टम को किसी खाड़ी देश को ट्रांसफर या बेचने की संभावना पर काम कर रहा है। बताया जा रहा है कि इसका मकसद अमेरिका के CAATSA प्रतिबंधों से राहत पाना और F-35 स्टील्थ फाइटर जेट कार्यक्रम में दोबारा शामिल होना है। इस पूरे घटनाक्रम के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई पहल को अहम वजह माना जा रहा है।
आखिर S-400 पर क्यों फंसा था अमेरिका और तुर्की का विवाद
तुर्की ने 2017 में रूस से S-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने का समझौता किया था और 2019 में इसकी डिलीवरी शुरू हुई। इसके बाद अमेरिका ने कहा कि रूसी एयर डिफेंस सिस्टम और अमेरिकी F-35 स्टील्थ फाइटर एक साथ नहीं रह सकते क्योंकि इससे F-35 की संवेदनशील तकनीक की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। इसी कारण अमेरिका ने तुर्की को F-35 कार्यक्रम से बाहर कर दिया और 2020 में CAATSA कानून के तहत प्रतिबंध भी लगाए।
ट्रंप के फैसले ने कैसे बदला पूरा समीकरण
हाल ही में NATO शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए कि वह तुर्की पर लगे प्रतिबंध हटाने के पक्ष में हैं। उन्होंने यह भी कहा कि F-35 लड़ाकू विमानों की बिक्री पर विचार किया जा सकता है, हालांकि इसके लिए अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी और कानूनी अड़चनें अभी भी मौजूद हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, इसी रास्ते को आसान बनाने के लिए तुर्की S-400 सिस्टम को किसी तीसरे देश को स्थानांतरित करने के विकल्प पर विचार कर रहा है।
रूस से भी करनी होगी बात
S-400 रूस से खरीदा गया रक्षा सिस्टम है। ऐसे में इसे किसी अन्य देश को ट्रांसफर करने के लिए रूस की सहमति भी जरूरी मानी जा रही है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने पुष्टि की है कि इस मुद्दे पर रूस और तुर्की के बीच बातचीत चल रही है। हालांकि उन्होंने इसे बेहद संवेदनशील मामला बताया है।
भारत के लिए क्यों खास है ये
भारत ने रूस से पांच S-400 स्क्वाड्रन खरीदने का समझौता किया था। भारतीय वायुसेना में इसकी तैनाती के बाद यह देश की बहुस्तरीय वायु रक्षा प्रणाली का अहम हिस्सा बन चुका है। हाल के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी S-400 ने भारतीय हवाई सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसकी क्षमता 400 किलोमीटर तक हवाई लक्ष्यों को ट्रैक और इंटरसेप्ट करने की है। यह लड़ाकू विमान, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइल जैसे कई प्रकार के खतरों से एक साथ निपट सकता है। यदि तुर्की वास्तव में S-400 को किसी तीसरे देश को ट्रांसफर करता है और अमेरिका प्रतिबंध हटा देता है, तो अंकारा के लिए F-35 कार्यक्रम में वापसी का रास्ता खुल सकता है। हालांकि अंतिम फैसला अमेरिकी कांग्रेस, रूस की सहमति और दोनों देशों के बीच चल रही वार्ताओं पर निर्भर करेगा।