अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रुपया लगातार दबाव में है। डॉलर के मुकाबले रुपये में आई कमजोरी अब सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं रही, बल्कि इसका असर भारत की व्यापारिक ताकत, महंगाई और रणनीतिक स्थिति पर भी दिखने लगा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस हालात का सबसे बड़ा फायदा चीन उठा रहा है।
हाल के महीनों में रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंचा। बढ़ती कच्चे तेल की कीमतें, विदेशी निवेश की निकासी और वैश्विक अनिश्चितताओं ने भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ाया है। कमजोर रुपये का सीधा असर आयात पर पड़ रहा है, जिससे पेट्रोल-डीजल, इलेक्ट्रॉनिक्स और रोजमर्रा की चीजें महंगी होने का खतरा बढ़ गया है।
दूसरी ओर चीन अपनी मुद्रा युआन और मजबूत निर्यात रणनीति के जरिए वैश्विक बाजार में बढ़त बनाने की कोशिश कर रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि रुपये के मुकाबले युआन की मजबूती से चीन को एशियाई व्यापार में अतिरिक्त फायदा मिल सकता है। इससे भारतीय उद्योगों पर प्रतिस्पर्धी दबाव बढ़ने की आशंका है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2026 में भी माना गया कि कमजोर रुपया कुछ हद तक निर्यात को सहारा दे सकता है, लेकिन लगातार गिरावट लंबी अवधि में चिंता बढ़ा सकती है। खासकर तब, जब भारत का आयात बिल लगातार बढ़ रहा हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रुपये में गिरावट का सिलसिला जारी रहा तो भारत को महंगाई, व्यापार घाटे और विदेशी मुद्रा दबाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि सरकार और RBI स्थिति संभालने के लिए रणनीतिक कदमों पर काम कर रहे हैं।