भारत का चीनी उद्योग आने वाले वर्षों में बड़ी चुनौती का सामना कर सकता है। मौसम विशेषज्ञों द्वारा अल-नीनो की आशंका जताए जाने और इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने के बढ़ते उपयोग के कारण देश में चीनी का अधिशेष उत्पादन घट सकता है। इसका असर यह हो सकता है कि भारत अगले कुछ वर्षों तक बड़े पैमाने पर चीनी निर्यात करने की स्थिति में न रहे।
भारत लंबे समय तक दुनिया के प्रमुख चीनी निर्यातकों में शामिल रहा है, लेकिन हालात तेजी से बदल रहे हैं। कमजोर मानसून की आशंका से गन्ना उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जबकि दूसरी ओर सरकार की इथेनॉल मिश्रण नीति के चलते गन्ने का बड़ा हिस्सा ईंधन उत्पादन की ओर जा रहा है। इससे चीनी के लिए उपलब्ध कच्चे माल पर दबाव बढ़ने की संभावना है।
अल-नीनो क्यों बढ़ा रहा चिंता?
अल-नीनो की स्थिति बनने पर भारत के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश हो सकती है। गन्ना एक ऐसी फसल है जो पर्याप्त पानी पर निर्भर करती है। यदि मानसून कमजोर रहता है तो गन्ने की पैदावार और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर आगामी फसली सीजन पर भी दिखाई दे सकता है।
इथेनॉल नीति से बदला समीकरण
सरकार पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने पर जोर दे रही है। इसके लिए चीनी मिलें गन्ने और शीरे का बड़ा हिस्सा इथेनॉल उत्पादन में लगा रही हैं। इससे ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा मिल रहा है, लेकिन चीनी उत्पादन पर दबाव भी बन रहा है। उद्योग से जुड़े जानकारों का कहना है कि घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देने की स्थिति में निर्यात योग्य चीनी की मात्रा लगातार कम हो सकती है।
वैश्विक बाजार पर भी पड़ सकता है असर
भारत दुनिया के बड़े चीनी उत्पादक और निर्यातक देशों में गिना जाता है। यदि भारतीय निर्यात में कमी आती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इससे वैश्विक कीमतों में तेजी आने की आशंका भी जताई जा रही है।
घरेलू बाजार पर क्या होगा प्रभाव?
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार घरेलू मांग और कीमतों को नियंत्रित रखने को प्राथमिकता दे सकती है। ऐसे में निर्यात पर सख्त नियंत्रण जारी रह सकता है। यदि उत्पादन और खपत के बीच अंतर और कम हुआ तो भविष्य में भारत को चीनी आयात जैसे विकल्पों पर भी विचार करना पड़ सकता है।