‘असाधारण कानून को सामान्य प्रक्रिया बना दिया’, MP हाईकोर्ट की टिप्पणी

जबलपुर। डिजिटल डेस्क

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के इस्तेमाल को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने दो सगे भाइयों राजेंद्र ठाकुर उर्फ छोटू और राजेश ठाकुर उर्फ भैया की निवारक हिरासत का आदेश रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने निवारक हिरासत को असाधारण उपाय के रूप में परिकल्पित किया था, लेकिन वर्षों से इसके लापरवाहीपूर्ण इस्तेमाल के कारण इसे सामान्य कार्यवाही की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा है।

जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह की खंडपीठ ने 11 सितंबर 2026 को दोनों भाइयों की याचिकाओं पर यह आदेश पारित किया। अदालत ने माना कि हिरासत का आदेश गलत तथ्यों, पुराने मामलों के गलत विवरण और अधिकारियों की ओर से स्वतंत्र रूप से विचार नहीं किए जाने की समस्या से प्रभावित था।

क्या है पूरा मामला

यह मामला जबलपुर के दो सगे भाइयों राजेंद्र ठाकुर और राजेश ठाकुर से जुड़ा है। जबलपुर के जिला मजिस्ट्रेट ने 6 जनवरी 2026 को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980 के तहत दोनों को तीन महीने के लिए निरुद्ध करने का आदेश जारी किया था। बाद में हिरासत की अवधि बढ़ाई गई।

प्रशासन की ओर से दलील दी गई थी कि दोनों की गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा थीं। पुलिस रिपोर्ट में उनके खिलाफ कई आपराधिक मामलों का उल्लेख किया गया था। इसी आधार पर निवारक हिरासत की कार्रवाई की सिफारिश की गई।

दोनों भाइयों ने हाईकोर्ट में हिरासत के आदेश को चुनौती दी। उनका कहना था कि प्रशासन ने उनके पुराने आपराधिक मामलों की स्थिति सही तरीके से दर्ज नहीं की और गलत तथ्यों के आधार पर हिरासत का आदेश पारित किया।

पुराने मामलों में बरी होने के बावजूद लंबित दिखाया

सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि हिरासत के आदेश में कई पुराने मामलों को लंबित बताया गया था, जबकि संबंधित मामलों में आरोपी बरी हो चुके थे।

अदालत ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि जिन 14 मामलों को लंबित विचारण के रूप में दर्शाया गया था, उनमें से 11 में संबंधित याचिकाकर्ता पहले ही बरी हो चुका था। इन तथ्यों का राज्य की ओर से दाखिल अतिरिक्त जवाब में खंडन भी नहीं किया गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक रिकॉर्ड की गलत जानकारी के आधार पर निवारक हिरासत का आदेश पारित करना गंभीर खामी है। अदालत के अनुसार, संबंधित अधिकारियों को रिकॉर्ड की जांच करनी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने उपलब्ध जानकारी का सही सत्यापन किए बिना कार्रवाई आगे बढ़ाई।

एक ही दिन में पूरी हुई कार्रवाई पर सवाल

हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों से लेकर जिला मजिस्ट्रेट तक फाइल के तेजी से आगे बढ़ने पर भी सवाल उठाए।

अदालत के आदेश के अनुसार, 6 जनवरी 2026 को नगर पुलिस अधीक्षक, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक और पुलिस अधीक्षक के स्तर से रिपोर्ट आगे बढ़ाई गई। इसी दिन जिला मजिस्ट्रेट ने भी हिरासत का आदेश पारित कर दिया।

खंडपीठ ने माना कि एक ही दिन में पूरी प्रक्रिया आगे बढ़ने और अधिकारियों के पत्रों की भाषा से स्वतंत्र रूप से विचार किए जाने का अभाव दिखाई देता है। अदालत ने कहा कि तथ्यों की पुष्टि के लिए क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम्स (CCTNS) का सहारा लिया जा सकता था।

NSA के इस्तेमाल पर अदालत की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों की सुरक्षा पर जोर दिया।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि निवारक हिरासत जैसी असाधारण शक्ति का इस्तेमाल करते समय संबंधित अधिकारी को तथ्यों और परिस्थितियों पर स्वतंत्र रूप से विचार करना जरूरी है। केवल पुराने आपराधिक मामलों की सूची के आधार पर इस तरह की कार्रवाई नहीं की जा सकती, खासकर तब जब रिकॉर्ड में ही गलतियां मौजूद हों।

हाईकोर्ट ने हिरासत का आदेश किया रद्द

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि गलत जानकारी, रिकॉर्ड का सत्यापन नहीं करने और स्वतंत्र रूप से विचार किए जाने के अभाव ने हिरासत के आदेश को कानूनी रूप से प्रभावित किया है।

इसके बाद हाईकोर्ट ने 6 जनवरी 2026 को जिला मजिस्ट्रेट, जबलपुर की ओर से जारी हिरासत के आदेश को निरस्त कर दिया। राजेंद्र ठाकुर और राजेश ठाकुर की दोनों याचिकाओं को स्वीकार करते हुए उनका निपटारा कर दिया गया।

यह फैसला निवारक हिरासत की शक्ति के इस्तेमाल में प्रशासनिक जवाबदेही और मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के महत्व को रेखांकित करता है।

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