नई दिल्ली। डिजिटल डेस्क
चुनाव आयोग और राहुल गांधी के बीच SIR के दौरान इस्तेमाल हो रहे Form-6 को लेकर विवाद सोमवार को और तेज हो गया। चुनाव आयोग ने राहुल गांधी के आरोपों को भ्रामक बताते हुए कहा कि मूल Form-6 में कॉमा या पूर्ण विराम तक नहीं बदला गया है। आयोग के मुताबिक, SIR के दौरान Form-6 के साथ केवल एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़ा गया है।
यह विवाद उस समय बढ़ा, जब 5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि उसने Form-6 के किसी संशोधित प्रारूप को मंजूरी नहीं दी है। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड सामने आने के बाद वह देखना चाहेगी कि Form-6 में बदलाव किसने किया।
राहुल गांधी ने CEC पर लगाया था आरोप
राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पोस्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर Form-6 में गैर-कानूनी और एकतरफा तरीके से बदलाव करने का आरोप लगाया था।
उन्होंने चुनाव आयोग के 26 सितंबर 2026 के प्रेस नोट का हवाला देते हुए सवाल उठाया था कि Form-6 से जुड़े नए घोषणा-पत्र को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी कैसे बताई गई।
EC ने कहा- मूल Form-6 में कोई बदलाव नहीं
चुनाव आयोग ने 5 अक्टूबर को राहुल गांधी के पोस्ट का फैक्ट-चेक जारी करते हुए उनके बयान को भ्रामक बताया।
EC के अनुसार, बिहार में SIR के लिए 24 जून 2025 को जारी आदेश आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी से जारी हुआ था। आयोग ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 के अपने फैसले में बिहार SIR से जुड़े इस आदेश को बरकरार रखा था।
आयोग का कहना है कि मूल Form-6 में कोई बदलाव नहीं किया गया, बल्कि SIR प्रोटोकॉल के तहत उसके साथ एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़ा गया। चुनाव आयोग के अधिकारियों ने इसे स्पष्ट करते हुए कहा कि मूल फॉर्म में “कॉमा या फुल स्टॉप” तक नहीं बदला गया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
इसी मामले की सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची तथा वी. मोहना की पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने किसी संशोधित Form-6 को मंजूरी नहीं दी है।
पीठ ने यह भी कहा कि जब संबंधित रिकॉर्ड उसके सामने पेश किए जाएंगे, तब यह देखा जाएगा कि Form-6 में बदलाव किसने किया। कोर्ट ने इस मामले में नोटिस जारी करते हुए इसे Form-6 से जुड़े एक अन्य मामले के साथ जोड़ दिया।
विवाद की शुरुआत कहां से हुई
Form-6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में पहली बार नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है। SIR के दौरान इसके ऑनलाइन संस्करण के साथ एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़े जाने को लेकर विवाद शुरू हुआ।
इस घोषणा-पत्र में आवेदक से उसके या उसके माता-पिता के पिछले SIR की मतदाता सूची में नाम होने जैसी जानकारी मांगी गई। इसी बदलाव की प्रक्रिया और उसे लागू करने के अधिकार को लेकर सवाल उठे हैं।
EC और सुप्रीम कोर्ट के रुख में क्या अंतर है
मामले में अभी दो अलग-अलग बातें सामने आई हैं। ECI का कहना है कि मूल Form-6 में कोई बदलाव नहीं हुआ और अतिरिक्त घोषणा-पत्र SIR प्रोटोकॉल का हिस्सा है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उसने किसी modified Form-6 को मंजूरी नहीं दी और रिकॉर्ड देखकर बदलाव की प्रक्रिया की जांच की जाएगी।
इसलिए फिलहाल विवाद का मुख्य सवाल यह है कि Form-6 के साथ जोड़ा गया अतिरिक्त घोषणा-पत्र किस प्रक्रिया के तहत लागू किया गया और उसके लिए किस स्तर पर मंजूरी ली गई। मामले पर अदालत की आगे की कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी।