शरद पूर्णिमा: चित्रकूट में दवा और दुआ का संगम, चांदनी रात में खीर खाने पहुंचे हजारों दमा रोगी

चित्रकूट। डिजिटल डेस्क

शरद पूर्णिमा की चांदनी रात, उपलों की आग पर पकती खीर और उसमें मिलाई जाने वाली पारंपरिक औषधि। धर्मनगरी चित्रकूट में शरद पूर्णिमा पर दमा और श्वास संबंधी परेशानी से जूझ रहे लोगों के लिए यह परंपरा खास महत्व रखती है। इस आयोजन में शामिल होने के लिए देश के कोने-कोने से मरीज पहुंचते हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इस बार करीब 60 हजार लोगों ने यहां औषधियुक्त खीर का सेवन किया।

मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं के साथ अमृत वर्षा करता है। इसी विश्वास के चलते लोग खीर बनाकर रातभर खुले आसमान के नीचे रखते हैं। चित्रकूट में इस परंपरा का स्वरूप कुछ अलग है। यहां खीर के साथ दमा के लिए पारंपरिक औषधि दी जाती है।

उपलों की आग पर पकाते हैं खीर, फिर पत्तल में फैलाते हैं

चित्रकूट पहुंचने वाले कई लोग अपने हाथों से खीर तैयार करते हैं। दूध और चावल से बनी खीर को पारंपरिक तरीके से उपलों की आग पर पकाया जाता है। इसके बाद खीर को पत्तल में निकालकर फैला दिया जाता है, ताकि वह ठंडी हो सके और खुले आसमान के नीचे रखी जा सके।

रातभर चांदनी में रखी खीर को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष आस्था रहती है। इस दौरान आश्रमों में भी खीर तैयार करने और उसे श्रद्धालुओं तक पहुंचाने की व्यवस्था की जाती है।

आश्रम के कर्मचारी खीर में मिलाते हैं औषधि

इस आयोजन का खास हिस्सा खीर में पारंपरिक औषधि मिलाने की प्रक्रिया है। आश्रम के कर्मचारी एक-एक मरीज की खीर में औषधि डालते हैं। इसके बाद मरीज निर्धारित समय पर खीर ग्रहण करते हैं।

इस परंपरा में शामिल होने के लिए कई लोग रात में ही आश्रमों और आसपास के क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं। मरीजों के साथ उनके परिजन भी आते हैं। बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी के कारण आयोजन के दौरान खीर तैयार करने और वितरित करने की व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है।

ब्रह्म मुहूर्त में खीर खाने के बाद मंदाकिनी में स्‍नान

परंपरा के अनुसार, श्रद्धालु ब्रह्म मुहूर्त में औषधियुक्त खीर का सेवन करते हैं। इसके बाद कई लोग मंदाकिनी नदी में स्नान करते हैं और भगवान कामदगिरि की परिक्रमा के लिए निकल पड़ते हैं।

इस तरह शरद पूर्णिमा का आयोजन खीर खाने तक सीमित नहीं रहता। इसमें धार्मिक आस्था, मंदाकिनी में स्नान और कामदगिरि की परिक्रमा भी शामिल होती है। चित्रकूट की इस परंपरा के कारण शरद पूर्णिमा पर यहां दूर-दराज से श्रद्धालुओं और मरीजों के पहुंचने का सिलसिला बना रहता है।

आस्था के साथ उपचार संबंधी सावधानी भी जरूरी

चित्रकूट में औषधियुक्त खीर खाने की यह परंपरा लोगों की धार्मिक आस्था और पारंपरिक मान्यताओं से जुड़ी है। हालांकि, खीर या उसमें मिलाई जाने वाली पारंपरिक औषधि से दमा ठीक होने का दावा चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित नहीं माना जाना चाहिए।

दमा एक दीर्घकालिक श्वसन रोग है। मरीजों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार अपनी दवाएं और इनहेलर जारी रखने चाहिए। किसी भी पारंपरिक औषधि का सेवन करने से पहले उसके घटकों और संभावित दुष्प्रभावों के बारे में योग्य चिकित्सक से सलाह लेना जरूरी है।

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