नई दिल्ली। डिजिटल डेस्क
भारत के डिजिटल डेटा संरक्षण कानून को लेकर मीडिया की स्वतंत्रता और नागरिकों की निजता के बीच बहस तेज हो गई है। मुकेश अंबानी के Network18 और गौतम अडानी के NDTV समेत 21 समाचार प्रकाशकों ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून के प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। प्रकाशकों की प्रमुख चिंता है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट कानूनी छूट नहीं होने से खोजी खबरों, गोपनीय सूत्रों और जनहित में प्रकाशित समाचारों पर असर पड़ सकता है।
क्या है डेटा प्रोटेक्शन कानून
भारत में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 संसद से पारित कानून है। इसका उद्देश्य व्यक्तियों के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल को नियंत्रित करना और उनकी निजता की रक्षा करना है।
कानून के तहत व्यक्तिगत डेटा का इस्तेमाल करने वाली संस्थाओं पर निर्धारित शर्तों के अनुसार जिम्मेदारियां लागू होती हैं। इनमें डेटा के इस्तेमाल की जानकारी देना, जहां आवश्यक हो वहां सहमति लेना और निर्धारित परिस्थितियों में डेटा से जुड़े अधिकारों का सम्मान करना शामिल है।
केंद्र सरकार ने 13 नवंबर 2025 को अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों को लागू करने की समयसीमा अधिसूचित की थी। इसके अनुसार, अधिनियम के कई प्रमुख प्रावधान 18 महीने बाद लागू होने हैं। इसलिए सभी प्रावधानों को पहले से पूरी तरह लागू मानना सही नहीं होगा।
अंबानी और अडानी के मीडिया संस्थानों को क्यों है आपत्ति
डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) के माध्यम से समाचार प्रकाशकों ने कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट की मांग उठाई है।
इस समूह में Network18 और NDTV जैसे मीडिया संस्थानों के अलावा अन्य समाचार प्रकाशक भी शामिल हैं।
मीडिया संस्थानों की चिंता है कि व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल से संबंधित नियमों की वजह से पत्रकारों को खोजी रिपोर्टिंग के दौरान कानूनी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
मसलन, यदि कोई पत्रकार किसी सरकारी अधिकारी या कारोबारी से जुड़े कथित भ्रष्टाचार की जांच करता है, तो उस जांच में संबंधित लोगों की व्यक्तिगत जानकारी और दस्तावेजों का इस्तेमाल हो सकता है।
ऐसे मामलों में डेटा संरक्षण संबंधी दायित्वों और जनहित में जानकारी प्रकाशित करने के अधिकार के बीच टकराव की आशंका जताई जा रही है।
क्या भ्रष्टाचार की खबर प्रकाशित करने से पहले लेनी होगी सहमति
यह विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
कानून की धारा 5 व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल से पहले सूचना देने से संबंधित है, जबकि धारा 6 सहमति के प्रावधानों से जुड़ी है।
मीडिया संस्थानों की चिंता है कि यदि इन प्रावधानों की व्याख्या खोजी पत्रकारिता पर भी लागू होती है, तो पत्रकारों के लिए किसी व्यक्ति के खिलाफ जांच करना मुश्किल हो सकता है।
उदाहरण के लिए, किसी सरकारी योजना में कथित गड़बड़ी की जांच कर रहे पत्रकार को संबंधित व्यक्तियों के रिकॉर्ड की जरूरत पड़ सकती है। यदि जांच के विषय को पहले ही जानकारी देने या सहमति लेने की बाध्यता लागू होती है, तो सबूत नष्ट होने अथवा गवाहों को प्रभावित किए जाने का जोखिम पैदा हो सकता है।
हालांकि, कानून में ऐसा कोई सीधा प्रावधान नहीं है जो हर समाचार प्रकाशित करने से पहले संबंधित व्यक्ति की अनुमति लेना अनिवार्य बनाता हो। विवाद इस बात को लेकर है कि व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल संबंधी नियम खोजी पत्रकारिता पर किस तरह लागू होंगे।
डेटा मिटाने का अधिकार भी बना विवाद की वजह
अधिनियम की धारा 12 व्यक्तिगत डेटा को सुधारने और मिटाने के अधिकार से संबंधित है।
समस्या तब पैदा हो सकती है, जब कोई व्यक्ति किसी समाचार रिपोर्ट में मौजूद अपनी व्यक्तिगत जानकारी हटाने की मांग करे।
उदाहरण के लिए, किसी कंपनी के खिलाफ प्रकाशित खबर में उसके संचालक का नाम और उससे संबंधित जानकारी शामिल है। यदि संबंधित व्यक्ति डेटा मिटाने की मांग करता है, तो सवाल उठ सकता है कि उसके निजता संबंधी अधिकार और सार्वजनिक हित में प्रकाशित खबर के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
मीडिया संस्थानों की चिंता है कि इस तरह के विवादों में स्पष्ट सुरक्षा नहीं होने से तथ्यात्मक समाचारों को हटाने या उनमें बदलाव करने का दबाव पैदा हो सकता है।
हालांकि, डेटा मिटाने का अधिकार अपने आप किसी व्यक्ति को हर समाचार रिपोर्ट हटवाने का अधिकार नहीं देता। प्रत्येक मामले में संबंधित कानून और परिस्थितियों को देखना होगा।
क्या पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर हो सकती है
खोजी पत्रकारिता में कई बार सरकारी विभागों, कंपनियों या अन्य संस्थानों के अंदर काम करने वाले लोग महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराते हैं। ऐसे लोग अक्सर अपनी पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर दस्तावेज साझा करते हैं।
मीडिया संस्थानों ने डेटा संरक्षण कानून के तहत जानकारी मांगने की सरकारी शक्तियों को लेकर भी चिंता जताई है।
अधिनियम की धारा 36 केंद्र सरकार को कानून के तहत निर्धारित परिस्थितियों में डेटा फिड्यूशियरी या मध्यस्थ से जानकारी मांगने की शक्ति देती है।
प्रकाशकों की चिंता है कि यदि इन शक्तियों के इस्तेमाल की स्पष्ट सीमाएं नहीं होंगी, तो पत्रकारों के पास मौजूद जानकारी और गोपनीय सूत्रों की पहचान प्रभावित हो सकती है।
इससे भ्रष्टाचार, चुनावी अनियमितताओं और कंपनियों से जुड़ी गड़बड़ियों की जानकारी देने वाले लोग पत्रकारों से संपर्क करने में हिचक सकते हैं।
हालांकि, यह एक संभावित जोखिम को लेकर जताई गई चिंता है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कानून के तहत हर स्थिति में पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर करना अनिवार्य होगा।
निजता की सुरक्षा भी जरूरी
डेटा संरक्षण कानून का दूसरा पक्ष भी महत्वपूर्ण है। डिजिटल प्लेटफॉर्म, कंपनियां और अन्य संस्थान लोगों की निजी जानकारी एकत्र करते हैं। ऐसी जानकारी का दुरुपयोग होने पर नागरिकों की निजता और सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
इसलिए डेटा सुरक्षा के नियमों की जरूरत को नकारा नहीं जा सकता। सवाल यह है कि इन नियमों को लागू करते समय जनहित में काम करने वाले पत्रकारों के लिए पर्याप्त कानूनी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए।
कानून की धारा 17 में कुछ परिस्थितियों के लिए छूट का प्रावधान है, लेकिन पत्रकारिता के लिए अलग और स्पष्ट छूट की मांग इस विवाद का प्रमुख हिस्सा है।
आगे क्या होगा
मामले में अदालत के सामने मुख्य प्रश्न यह होगा कि डेटा संरक्षण के उद्देश्य और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
मीडिया संस्थानों की मांग है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट सुरक्षा हो, ताकि जनहित में जांच और समाचार प्रकाशन करने वाले संस्थानों को अनिश्चित कानूनी जोखिम का सामना न करना पड़े।
दूसरी ओर, नागरिकों की निजी जानकारी की सुरक्षा भी कानून का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।
इस विवाद का असर केवल बड़े मीडिया समूहों तक सीमित नहीं रह सकता। छोटे डिजिटल न्यूज पोर्टल और स्वतंत्र पत्रकार भी व्यक्तिगत डेटा का इस्तेमाल करते समय इससे जुड़े कानूनी सवालों का सामना कर सकते हैं।