भिंड। डिजिटल डेस्क
चंबल में कभी डकैतों का खौफ कानून-व्यवस्था की बड़ी चुनौती था। अब हालात बदल चुके हैं, लेकिन उस दौर में बनाया गया मध्यप्रदेश डकैती और व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम, 1981 अब भी लागू है। इसी कानून की संवैधानिक वैधता को लेकर ग्वालियर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है।
गोविंद सिंह ने दाखिल की जनहित याचिका
लहार के पूर्व विधायक, पूर्व नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. गोविंद सिंह ने याचिका के जरिए इस कानून को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि जब सरकार खुद विधानसभा में प्रदेश में कोई सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं होने की बात कह चुकी है, तो विशेष डकैत कानून को जारी रखने का औचित्य क्या है।
1981 में डकैतों से निपटने के लिए बना था कानून
यह अधिनियम उस दौर में बनाया गया था, जब चंबल और आसपास के इलाकों में दस्यु गिरोह बड़ी चुनौती थे। कानून में विशेष अदालतों, कठोर दंड और अपराध से अर्जित संपत्ति की कुर्की जैसे प्रावधान किए गए।
याचिका में कहा गया है कि परिस्थितियां बदलने के बावजूद कानून की कुछ धाराओं का इस्तेमाल सामान्य आपराधिक मामलों में भी किया जा रहा है। याचिकाकर्ता ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 से जुड़े अधिकारों के संदर्भ में चुनौती दी है।
सरकार क्यों नहीं खत्म करना चाहती कानून
सरकार का पक्ष याचिकाकर्ता से अलग है। विधानसभा में सरकार ने कहा है कि सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं होने का मतलब यह नहीं है कि डकैती की समस्या पूरी तरह खत्म हो गई है। सरकार के अनुसार पड़ोसी राज्यों से आने वाले असूचीबद्ध गिरोहों और सीमावर्ती इलाकों की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए कानून की जरूरत अब भी बनी हुई है। दिसंबर 2024 में सरकार ने विधानसभा में इसे डकैती की समस्या नियंत्रित करने में प्रभावी बताते हुए कानून को आवश्यक बताया था।
अभी किन इलाकों में लागू है
सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक यह कानून ग्वालियर, मुरैना, भिंड, दतिया, शिवपुरी और श्योपुर में पूरी तरह लागू है। इसके अलावा रीवा, सतना और पन्ना के कुछ थाना क्षेत्रों में भी इसकी प्रभावशीलता है।
हाईकोर्ट से क्या मांग की गई
याचिका में हाईकोर्ट से मुख्य रूप से तीन मांगें की गई हैं—
- 1981 के अधिनियम को असंवैधानिक घोषित किया जाए।
- वर्ष 2017 से अब तक इस कानून के तहत दर्ज मामलों का रिकॉर्ड तलब किया जाए।
- कानून के तहत लंबित मामलों को सक्षम सामान्य अदालतों में स्थानांतरित किया जाए।
कानून की सख्ती भी सवालों के घेरे में
याचिका में कानून के तहत लागू कठोर प्रावधानों पर भी सवाल उठाए गए हैं। अधिनियम में विशेष न्यायालयों का प्रावधान है और अग्रिम जमानत से जुड़ी पाबंदियां भी हैं। यही वजह है कि याचिकाकर्ता ने बदली परिस्थितियों में कानून की जरूरत और संवैधानिकता की न्यायिक समीक्षा की मांग की है।