नई दिल्ली। डिजिटल डेस्क
दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान लाखों मतदाताओं को जारी नोटिस का मामला मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। सुनवाई के दौरान अदालत ने 33 लाख से अधिक मतदाताओं को नोटिस जारी किए जाने की प्रक्रिया पर सवाल किए और कहा कि प्रथमदृष्टया नोटिस लगभग यांत्रिक तरीके से जारी किए गए प्रतीत होते हैं।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने चुनाव आयोग से यह स्पष्ट करने को कहा कि मतदाताओं के रिकॉर्ड में ‘Logical Discrepancy’ यानी तार्किक विसंगति तय करने का आधार क्या है। कोर्ट ने इतनी बड़ी संख्या में नोटिस जारी करने और आगे की प्रक्रिया पूरी करने के लिए लगाए गए कर्मचारियों की संख्या की जानकारी भी मांगी।
33 लाख से ज्यादा मतदाताओं को नोटिस
सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि दिल्ली SIR में 30 लाख से अधिक मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने करीब 33.13 लाख मतदाताओं को जारी नोटिस से संबंधित बूथवार जानकारी सार्वजनिक की है। इसमें ऐसे मतदाता भी शामिल हैं, जिनके रिकॉर्ड में ‘Logical Discrepancy’ या पुराने रिकॉर्ड से मैपिंग नहीं होने जैसी स्थिति सामने आई।
दिल्ली CEO की ओर से 19 सितंबर को प्रकाशित बूथवार डेटा में संबंधित मतदाताओं के रिकॉर्ड में सामने आई विसंगतियों के कारण भी बताए गए हैं। इससे पहले याचिका में नोटिस पाने वाले मतदाताओं के नाम और नोटिस जारी किए जाने का कारण सार्वजनिक करने की मांग की गई थी।
‘Logical Discrepancy’ पर कोर्ट ने मांगा स्पष्टीकरण
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान खास तौर पर ‘Logical Discrepancy’ की श्रेणी पर सवाल किया। कोर्ट ने चुनाव आयोग से यह स्पष्ट करने को कहा कि किसी मतदाता के रिकॉर्ड को इस श्रेणी में रखने के लिए कौन से मानदंड अपनाए गए।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने कहा कि नोटिस लगभग यांत्रिक तरीके से जारी किए गए प्रतीत होते हैं और ‘Logical Discrepancy’ की पहचान का आधार स्पष्ट किए जाने की जरूरत है।
कोर्ट ने पूछा- इतने नोटिस के लिए कितने कर्मचारी लगाए
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से SIR प्रक्रिया के लिए उपलब्ध मानव संसाधन को लेकर भी सवाल किया। 30 लाख से अधिक नोटिस जारी होने का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने इस काम के लिए लगाए गए कर्मचारियों का विवरण मांगा।
यह सवाल नोटिस जारी करने के साथ मतदाताओं की सुनवाई और उनके दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया के संदर्भ में किया गया।
मतदाताओं के लिए FAQ जारी करने का सुझाव
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को प्रभावित मतदाताओं की सहायता के लिए FAQ यानी Frequently Asked Questions जारी करने का सुझाव भी दिया। इसका उद्देश्य नोटिस मिलने के बाद मतदाताओं को आगे की प्रक्रिया और जरूरी कदमों की जानकारी उपलब्ध कराना है।
क्यों पहुंचा मामला सुप्रीम कोर्ट
याचिकाकर्ताओं अंजलि भारद्वाज और अमृता जौहरी ने दिल्ली SIR की प्रक्रिया से संबंधित याचिका दाखिल की है। इसमें नोटिस पाने वाले मतदाताओं के नाम, उन्हें नोटिस जारी करने के कारण और ‘Logical Discrepancy’ निर्धारित करने के मानदंड सार्वजनिक करने की मांग की गई है।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने मामले को तत्काल सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए 22 सितंबर को अन्य लंबित SIR मामलों के साथ सुनने की बात कही थी।
47.6 लाख नाम ड्राफ्ट रोल से बाहर
दिल्ली में SIR के बाद 31 अगस्त को प्रकाशित ड्राफ्ट मतदाता सूची में करीब 47.6 लाख नाम पहले की सूची की तुलना में शामिल नहीं थे। हालांकि ड्राफ्ट सूची में नाम नहीं होना और किसी मतदाता का नाम अंतिम रूप से हटाया जाना एक ही बात नहीं है। SIR की दावा-आपत्ति और सत्यापन प्रक्रिया इसके बाद भी जारी रहती है।
चुनाव आयोग को नोटिस, दो सप्ताह बाद फिर सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने आयोग से ‘Logical Discrepancy’ और नोटिस जारी करने की प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। मामले को दो सप्ताह बाद फिर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है।
इसलिए मंगलवार की कार्यवाही को SIR प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं माना जाना चाहिए। फिलहाल कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा है और अगली सुनवाई में आयोग का पक्ष सामने आने के बाद मामला आगे बढ़ेगा।