इन देवी मंदिरों में चढ़ता है मांस का भोग, जानिए परंपरा

धर्म डेस्क। डिजिटल डेस्क

भारत में देवी की पूजा एक ही तरीके से नहीं होती। कहीं मां को हलवा-पूड़ी और मिठाई चढ़ाई जाती है, तो कहीं सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं में मछली, मांस और पशुबलि का भी उल्लेख मिलता है। खास बात यह है कि कुछ मंदिरों में बलि के बाद मांस प्रसाद के रूप में बांटे जाने की परंपरा भी बताई गई है।
असम के मां कामाख्या मंदिर से लेकर पश्चिम बंगाल के कालीघाट और तारापीठ तक, इन परंपराओं के स्वरूप अलग-अलग हैं। कहीं पशुबलि प्रमुख धार्मिक अनुष्ठान है, तो कहीं देवी को मछली या मांस का भोग अर्पित किया जाता है।

एक जरूरी बात: पशुबलि, देवी को मांसाहारी भोग चढ़ाना और मांस को प्रसाद के रूप में बांटना तीन अलग-अलग बातें हैं। इन मंदिरों की परंपराओं को समझने के लिए इनके बीच का अंतर जानना जरूरी है।
मां कामाख्या मंदिर: जहां शक्ति उपासना में पशुबलि की परंपरा है

मां कामाख्या मंदिर: जहां शक्ति उपासना में पशुबलि की परंपरा है

असम के गुवाहाटी में नीलाचल पहाड़ी पर स्थित मां कामाख्या मंदिर देश के प्रमुख शक्तिपीठों में शामिल है। यह मंदिर शक्ति उपासना और तांत्रिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है।
मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट पर दुर्गा पूजा के दौरान होने वाले अनुष्ठानों में भैंस, बकरे, कबूतर और मछली की बलि का उल्लेख मिलता है। लौकी, कद्दू और गन्ने जैसी वस्तुओं की बलि का भी वर्णन है।

इससे स्पष्ट होता है कि यहां पशुबलि की परंपरा धार्मिक अनुष्ठानों का हिस्सा रही है। हालांकि, हर बलि के बाद मांस को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है, ऐसा निष्कर्ष इन विवरणों से नहीं निकाला जा सकता।
मां कामाख्या मंदिर की एक अन्य विशेषता अंबुबाची मेला है। यह उत्सव देवी की सृजन शक्ति और प्रकृति की उर्वरता से जुड़ी मान्यताओं के लिए जाना जाता है।

कालीघाट मंदिर: बलि के बाद मांस बांटने की परंपरा

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में स्थित कालीघाट मंदिर मां काली के प्रमुख मंदिरों में से एक है। यहां की पूजा परंपरा में पशुबलि और मांस के प्रसाद का उल्लेख मिलता है।
इंडिया टुडे की 6 जुलाई 2022 की रिपोर्ट में मंदिर के पुजारियों के हवाले से बताया गया था कि यहां पशुबलि दी जाती है और बलि के बाद मांस पकाकर श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में दिया जाता है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि मुख्य देवी को शाकाहारी भोग अर्पित किया जाता है, जबकि बलि से प्राप्त मांस डाकिनी-योगिनी से जुड़ी पूजा परंपरा में इस्तेमाल होता है।

यह विवरण एक महत्वपूर्ण अंतर सामने लाता है। मंदिर में मांस का प्रसाद वितरित होने का अर्थ यह नहीं कि मुख्य देवी की प्रतिमा को सीधे मांस ही चढ़ाया जाता है। पूजा की अलग-अलग विधियों को समझना जरूरी है।

तारापीठ मंदिर: मां तारा को मांस और मछली का भोग

पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित तारापीठ मां तारा का प्रसिद्ध मंदिर है। यह स्थान तांत्रिक साधना और शक्ति उपासना की परंपराओं के लिए जाना जाता है।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट में तारापीठ के पुजारियों के हवाले से बताया गया था कि यहां तांत्रिक परंपरा के अंतर्गत मां तारा को मांस और मछली का भोग अर्पित किया जाता है। रिपोर्ट में शाकाहारी भोजन और फलों के भोग का भी उल्लेख है।

इससे पता चलता है कि यहां पूजा की परंपरा में शाकाहारी और मांसाहारी, दोनों तरह की सामग्री का अलग-अलग संदर्भ मिलता है। इसे सभी देवी मंदिरों की सामान्य परंपरा मानना सही नहीं होगा।

तारापीठ की धार्मिक पहचान केवल मांसाहारी भोग तक सीमित नहीं है। यह मंदिर मां तारा की उपासना और तांत्रिक साधना के प्रमुख केंद्रों में गिना जाता है।

दक्षिणेश्वर मंदिर: मां काली को चढ़ाई जाती है मछली

कोलकाता के दक्षिणेश्वर में स्थित मां काली का मंदिर भी बंगाल की विशिष्ट धार्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है। यहां की पूजा पद्धति कालीघाट और तारापीठ से अलग है।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिणेश्वर मंदिर में मां काली को मछली का भोग अर्पित किया जाता है, लेकिन वहां पशुबलि नहीं दी जाती।

यह उदाहरण बताता है कि मांसाहारी भोग और पशुबलि को एक ही अर्थ में नहीं लेना चाहिए। किसी मंदिर में मछली का भोग लगने से यह जरूरी नहीं कि वहां पशुबलि भी होती हो।

मां महामाया मंदिर: 400 साल पुरानी पशुबलि परंपरा

असम के कोकराझार जिले के बोगरीबाड़ी में स्थित मां महामाया मंदिर भी पशुबलि की परंपरा के लिए जाना जाता है।
कोकराझार जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, मंदिर में दुर्गा पूजा के समय पशु-पक्षियों की बलि देने की लगभग 400 वर्ष पुरानी परंपरा रही है। प्रशासनिक विवरण में बकरे, भैंसे, कबूतर और बत्तख जैसे पशु-पक्षियों का उल्लेख मिलता है।

यहां उपलब्ध सरकारी जानकारी पशुबलि की परंपरा की पुष्टि करती है, लेकिन बलि दिए गए सभी पशु-पक्षियों का मांस प्रसाद के रूप में बांटे जाने की पुष्टि नहीं करती। इसलिए दोनों बातों को अलग रखना जरूरी है।

देवी को मांसाहारी भोग क्यों चढ़ाया जाता है

इन परंपराओं को समझने के लिए शक्ति उपासना और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं को जानना जरूरी है। विशेष रूप से बंगाल और असम में शाक्त तथा तांत्रिक परंपराओं का ऐतिहासिक प्रभाव रहा है।
कुछ परंपराओं में मांस और मछली को धार्मिक भोग का हिस्सा माना जाता है। वहीं अनेक मंदिरों में फल, मिठाई, नारियल और शाकाहारी भोजन ही अर्पित किए जाते हैं। अलग-अलग संप्रदायों में पूजा की विधि और इन सामग्रियों का धार्मिक अर्थ भी अलग हो सकता है।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि सभी काली या दुर्गा मंदिरों में मांस चढ़ाया जाता है। किसी मंदिर की परंपरा का उल्लेख करते समय उसके वास्तविक अनुष्ठान और स्थानीय मान्यताओं को ध्यान में रखना जरूरी है।

भोग, बलि और प्रसाद में क्या अंतर है

  • पशुबलि: धार्मिक अनुष्ठान के दौरान पशु की बलि देने की परंपरा।
  • मांसाहारी भोग: देवी को पूजा के दौरान मांस या मछली अर्पित करना।
  • मांस का प्रसाद: पूजा के बाद मांस को प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में वितरित करना।
    इन तीनों का स्वरूप अलग-अलग हो सकता है। उदाहरण के लिए, दक्षिणेश्वर में मछली के भोग का उल्लेख है, लेकिन वहां पशुबलि नहीं होने की जानकारी भी प्रकाशित हुई है। वहीं कालीघाट के संबंध में बलि के बाद मांस वितरण का विवरण मिलता है।

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