नई दिल्ली। डिजिटल डेस्क
दीपावली की रोशनी भले ही अब रंग-बिरंगी झालरों और इलेक्ट्रॉनिक लाइटों से सजने लगी हो, लेकिन मिट्टी के दीयों की चमक आज भी बरकरार है। बाजार में दीपावली की तैयारियों के साथ मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ने लगी है। इन दीयों के साथ सिर्फ त्योहार की परंपरा ही नहीं, बल्कि उन कुम्हार परिवारों की उम्मीदें भी जुड़ी हैं, जिनकी आजीविका इस मौसम की बिक्री पर काफी हद तक निर्भर करती है।
कुम्हार महीनों पहले से दीये बनाने की तैयारी शुरू कर देते हैं। मिट्टी तैयार करने से लेकर चाक पर दीये गढ़ने, उन्हें सुखाने और पकाने तक काफी मेहनत करनी पड़ती है। इसके बाद भी उनकी कमाई इस बात पर निर्भर करती है कि त्योहार के दिनों में कितने दीये बिकते हैं।
दूसरों के घर रोशन करने के लिए दिन-रात मेहनत
दीपावली नजदीक आते ही कुम्हारों के घरों और काम करने की जगहों पर गतिविधियां बढ़ जाती हैं। कहीं चाक पर दीये आकार लेते हैं, तो कहीं सूखे दीयों को बाजार में बिक्री के लिए तैयार किया जाता है।
इस काम में परिवार के दूसरे सदस्य भी हाथ बंटाते हैं। दीये बनाने और उन्हें बाजार तक पहुंचाने की मेहनत के बीच कुम्हारों को उम्मीद रहती है कि त्योहार पर अच्छी बिक्री होगी और परिवार की आमदनी बढ़ेगी।
हालांकि, उनके सामने लागत, मेहनत और बिक्री का संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी रहती है। अगर दीये नहीं बिके, तो उनकी मेहनत और तैयार माल दोनों पर असर पड़ सकता है। इसलिए स्थानीय लोगों की खरीदारी उनके लिए केवल कारोबार नहीं, बल्कि पारंपरिक हुनर को आगे बढ़ाने का सहारा भी है।
झालरों के बीच मिट्टी के दीयों की अपनी पहचान
आधुनिक दौर में घरों और दुकानों को सजाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक झालरों, रंगीन बल्बों और मोमबत्तियों का इस्तेमाल बढ़ा है। बाजार में आकर्षक डिजाइन वाले इलेक्ट्रॉनिक दीये भी उपलब्ध हैं। इसके बावजूद मिट्टी के दीयों का अपना अलग महत्व है।
घर के दरवाजे, आंगन, छत और पूजा स्थल पर दीये जलाने की परंपरा आज भी दीपावली का अभिन्न हिस्सा है। मिट्टी के दीये त्योहार को पारंपरिक रूप देते हैं और स्थानीय कारीगरों की कला से लोगों को जोड़ते हैं।
यही वजह है कि आधुनिक सजावट के विकल्पों के बीच भी बहुत से लोग पूजा और घर की सजावट के लिए मिट्टी के दीये खरीदना पसंद करते हैं।
दीयों के साथ लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों की भी मांग
दीपावली के बाजार में मिट्टी के दीयों के अलावा लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां और मिट्टी से बनी अन्य पूजन सामग्री भी खरीदी जाती है। इससे पारंपरिक मिट्टी के उत्पाद तैयार करने वाले कारीगरों को त्योहार के दौरान कारोबार मिलने की उम्मीद रहती है।
गांवों से लेकर छोटे और मझोले शहरों तक दीपावली के बाजार में इन उत्पादों की मौजूदगी परंपरा को जीवित रखती है। हालांकि, बिक्री कितनी बढ़ेगी, यह ग्राहकों की खरीदारी और बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगा।
एक दीया खरीदना, किसी परिवार की उम्मीद बढ़ाना
दीपावली पर खरीदारी करते समय मिट्टी के दीयों को प्राथमिकता देना स्थानीय कुम्हारों के लिए मददगार हो सकता है। इससे उनकी मेहनत को बाजार मिलता है और पारंपरिक मिट्टी कला को आगे बढ़ाने का अवसर भी।
इस बार घर को रोशन करने के लिए मिट्टी के कुछ दीये खरीदना एक छोटा-सा फैसला हो सकता है, लेकिन इसका असर उन परिवारों तक पहुंच सकता है, जो पीढ़ियों से इस हुनर को संभाले हुए हैं।
दीपावली का असली उजाला तभी और अर्थपूर्ण हो जाता है, जब अपने घरों को रोशन करने के साथ उन हाथों की मेहनत का भी सम्मान किया जाए, जो त्योहार के लिए दीये तैयार करते हैं।