नई दिल्ली। डिजिटल डेस्क।
भारत की राजधानी नई दिल्ली इस सप्ताह दुनिया की बड़ी कूटनीतिक गतिविधियों का केंद्र बनने जा रही है। 12 और 13 सितंबर को भारत 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में होने वाले इस सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन समेत BRICS के सदस्य देशों के नेता शामिल होने की उम्मीद है।
पुतिन-शी की मौजूदगी से क्यों बढ़ा सम्मेलन का महत्व
इस बार BRICS की बैठक ऐसे समय हो रही है जब दुनिया कई बड़े भू-राजनीतिक संकटों से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव, यूक्रेन युद्ध और वैश्विक व्यापार एवं ऊर्जा आपूर्ति पर बढ़ते दबाव के बीच BRICS देशों की बैठक का महत्व बढ़ गया है।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा की पुष्टि हो चुकी है। प्रधानमंत्री मोदी और पुतिन के बीच शुक्रवार को द्विपक्षीय बातचीत भी प्रस्तावित है। दोनों नेताओं के बीच व्यापार, ऊर्जा, रक्षा और अन्य रणनीतिक मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।
दूसरी ओर, शी जिनपिंग की भारत यात्रा पर खास नजर है। उनकी संभावित यात्रा सात साल बाद भारत में उनकी पहली यात्रा होगी। ऐसे में मोदी और शी की मुलाकात केवल BRICS तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसे भारत-चीन संबंधों में जारी सुधार की अगली बड़ी परीक्षा के तौर पर भी देखा जा रहा है।
मोदी के लिए BRICS सिर्फ सम्मेलन नहीं, कूटनीति की परीक्षा
भारत इस साल BRICS की अध्यक्षता कर रहा है। नई दिल्ली ने अपनी अध्यक्षता की थीम “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” रखी है। इसका जोर विकास, सहयोग और व्यावहारिक परिणामों पर है।
कोशिश BRICS को केवल राजनीतिक बयानबाजी का मंच बनाने के बजाय ऐसे मंच के रूप में आगे बढ़ाने की है, जहां सदस्य देश व्यापार, टेक्नोलॉजी, ऊर्जा, सप्लाई चेन और विकास से जुड़े ठोस मुद्दों पर सहयोग बढ़ा सकें।
भारत के एजेंडे में स्टार्टअप और इनोवेशन, मजबूत सप्लाई चेन, हरित ऊर्जा, राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दे प्रमुख बताए जा रहे हैं।
भारत-चीन रिश्तों पर भी रहेगी नजर
BRICS सम्मेलन का एक अहम पहलू भारत और चीन के बीच संबंध हैं। 2020 के सीमा विवाद के बाद दोनों देशों के रिश्तों में काफी तनाव आया था। पिछले कुछ समय में हालांकि दोनों पक्षों के बीच संवाद और संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिशें बढ़ी हैं।
शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा इसी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जा रही है। अगर मोदी और शी की मुलाकात होती है, तो दोनों नेताओं के सामने सीमा विवाद के साथ-साथ व्यापार, निवेश, वीजा और तकनीकी सहयोग जैसे मुद्दे भी रहेंगे।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि कूटनीतिक संबंधों में सुधार के बावजूद आर्थिक रिश्तों की राह अभी पूरी तरह आसान नहीं हुई है। दोनों देशों के कारोबारियों को निवेश, वीजा और कुछ औद्योगिक क्षेत्रों में नियामकीय अड़चनों का सामना करना पड़ रहा है।
पश्चिम एशिया का संकट भी बनेगा बड़ा मुद्दा
BRICS सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा हुआ है। अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष का असर ऊर्जा बाजार और वैश्विक व्यापार पर पड़ रहा है।
ईरान BRICS का सदस्य है, जबकि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी समूह में शामिल हो चुके हैं। ऐसे में पश्चिम एशिया के संकट पर BRICS के भीतर एक जैसी राय बनाना भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक चुनौती हो सकती है। संयुक्त घोषणा को लेकर सदस्य देशों के बीच भाषा और रुख पर बातचीत चल रही है।
11 देशों का विस्तारित BRICS
BRICS अब अपने पुराने पांच देशों—ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका—तक सीमित नहीं है। 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब इसके सदस्य बने, जबकि इंडोनेशिया 2025 में समूह में शामिल हुआ।
इस विस्तार ने BRICS का आर्थिक और भू-राजनीतिक प्रभाव बढ़ाया है। अब नई दिल्ली में होने वाली बैठक में भारत के सामने अलग-अलग हितों वाले देशों के बीच सहमति बनाने की चुनौती भी होगी।
दिल्ली में सुरक्षा के कड़े इंतजाम
BRICS सम्मेलन में कई बड़े देशों के राष्ट्राध्यक्षों की मौजूदगी को देखते हुए दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी की गई है। रिपोर्टों के मुताबिक करीब 30 हजार सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है। पुतिन के 11 सितंबर और शी जिनपिंग के 12 सितंबर को दिल्ली पहुंचने की संभावना बताई गई है।
सम्मेलन का मुख्य आयोजन भारत मंडपम में होगा। नेताओं की आवाजाही के दौरान राजधानी के कई इलाकों में सुरक्षा और यातायात व्यवस्था में बदलाव देखने को मिल सकता है।
दुनिया की नजर मोदी की ‘बैलेंसिंग डिप्लोमेसी’ पर
BRICS Summit में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग ध्रुवों के बीच संतुलन बनाए रखने की है। एक तरफ रूस के साथ भारत के पुराने रणनीतिक संबंध हैं, दूसरी तरफ चीन के साथ सीमा और व्यापार से जुड़े मतभेद हैं। वहीं पश्चिमी देशों के साथ भारत के आर्थिक और रणनीतिक संबंध भी लगातार महत्वपूर्ण बने हुए हैं।
ऐसे माहौल में मोदी की कोशिश यह दिखाने की होगी कि भारत किसी एक शक्ति खेमे का हिस्सा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र और संतुलित कूटनीति को आगे बढ़ा सकता है।
BRICS सम्मेलन के दौरान पुतिन और शी जिनपिंग के साथ संभावित बातचीत इसी रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण होगी। सम्मेलन से निकलने वाले आर्थिक और कूटनीतिक नतीजे यह भी बताएंगे कि भारत अपनी BRICS अध्यक्षता को कितनी प्रभावी तरह से ठोस परिणामों में बदल पाता है।