दतिया उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी की हार ने कई राजनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे अधिक चर्चा इस बात की है कि भाजपा वरिष्ठ नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा के प्रभाव वाले पोलिंग बूथ पर भी पार्टी बढ़त नहीं बना सकी। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह सिर्फ कांग्रेस की बेहतर रणनीति थी या भाजपा के भीतर की नाराजगी भी परिणाम पर असर डाल गई?
आखिर नरोत्तम मिश्रा के बूथ का परिणाम क्यों चर्चा में है
डॉ. नरोत्तम मिश्रा कई वर्षों तक दतिया की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं। ऐसे में उनके प्रभाव वाले मतदान केंद्र पर भाजपा का पिछड़ना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, भाजपा न केवल उपचुनाव हारी बल्कि मिश्रा के अपने मतदान केंद्र पर भी बढ़त नहीं बना सकी।
क्या टिकट कटने की नाराजगी पूरी तरह खत्म नहीं हुई
जब भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया था, तब पार्टी के कई कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन किया था। हाईवे जाम हुआ, स्थानीय नेताओं ने नाराजगी जताई और संगठन के भीतर असंतोष की खबरें भी सामने आई थीं। बाद में मिश्रा ने सार्वजनिक रूप से पार्टी प्रत्याशी के समर्थन में प्रचार किया, लेकिन चुनाव परिणाम के बाद फिर सवाल उठने लगे हैं कि क्या जमीनी स्तर पर पूरा संगठन एकजुट हो पाया था।
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कांग्रेस को कैसे मिला फायदा
कांग्रेस ने स्थानीय स्तर पर मजबूत बूथ प्रबंधन, लगातार जनसंपर्क और अपने पारंपरिक वोट बैंक को संगठित रखने पर जोर दिया। यदि भाजपा के भीतर कहीं भी असंतोष रहा होगा, तो उसका लाभ कांग्रेस को मिलना स्वाभाविक माना जा सकता है। हालांकि, परिणाम केवल इसी एक कारण से तय हुआ, ऐसा कहना सही नहीं होगा।
आगे भाजपा के सामने क्या चुनौती
दतिया का परिणाम भाजपा के लिए संगठनात्मक समीक्षा का अवसर है। पार्टी को यह देखना होगा कि हार केवल स्थानीय मुद्दों की वजह से हुई या टिकट बदलने के फैसले और संगठन के भीतर की स्थिति ने भी भूमिका निभाई। आने वाले दिनों में यदि पार्टी की समीक्षा बैठक या वरिष्ठ नेताओं के बयान आते हैं, तो तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।
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