उज्जैन। डिजिटल डेस्क।
सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के तहत सड़क चौड़ीकरण के लिए उज्जैन के प्राचीन खड़े हनुमान मंदिर को हटाने की कार्रवाई अब प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। मंदिर का ढांचा हट चुका है, लेकिन करीब 8 फीट ऊंची हनुमान प्रतिमा कई प्रयासों के बाद भी अपनी जगह से नहीं हिली।
चार दिन में चार कोशिशें, फिर भी नहीं हिली प्रतिमा
उज्जैन में कंठाल चौराहे से छत्री चौक तक सड़क चौड़ीकरण का काम सिंहस्थ 2028 की तैयारियों से जुड़ा है। इसी मार्ग की जद में खड़े हनुमान मंदिर का हिस्सा आ रहा था। प्रशासन ने मंदिर के ढांचे को हटाने के बाद प्रतिमा को सुरक्षित तरीके से दूसरी जगह ले जाने की कोशिश शुरू की।
रिपोर्टों के मुताबिक पिछले दिनों में प्रतिमा को हटाने के लिए कई प्रयास किए गए। भारी मशीनरी और अन्य तकनीकों का इस्तेमाल भी किया गया, लेकिन प्रतिमा अपनी जगह से नहीं हिली। इसके बाद प्रशासन ने फिलहाल जल्दबाजी में मशीनों से और प्रयास करने के बजाय विशेषज्ञों की मदद लेने का फैसला किया है।
मंदिर का ढांचा हट गया, प्रतिमा वहीं खड़ी
प्रतिमा को बारिश और संभावित नुकसान से बचाने के लिए फिलहाल उसके ऊपर कैनोपी लगाई गई है। मंदिर का मुख्य ढांचा हटाए जाने के बाद अब सड़क चौड़ीकरण की पूरी प्रक्रिया प्रतिमा के सुरक्षित विस्थापन पर अटक गई है।
इसी बीच प्रतिमा के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ भी बढ़ गई है। स्थानीय लोगों और हिंदू संगठनों का एक वर्ग प्रतिमा को हटाने का विरोध कर रहा है। मंगलवार को वहां हनुमान चालीसा और भजन-कीर्तन भी किए गए।
क्या यह चमत्कार है
प्रतिमा के नहीं हिलने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर तरह-तरह के दावे किए जा रहे हैं। कई श्रद्धालु इसे भगवान हनुमान का संकेत और चमत्कार मान रहे हैं। कुछ संतों और हिंदू संगठनों ने भी प्रतिमा को उसी स्थान पर रखने की मांग की है।
हालांकि, अब तक प्रशासन या किसी तकनीकी विशेषज्ञ ने प्रतिमा के नहीं हिलने को चमत्कार नहीं बताया है। वैज्ञानिक या तकनीकी कारणों की जांच अभी बाकी है। इसलिए प्रतिमा को लेकर वायरल हो रहे दावों को तथ्य के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
करीब 170 साल पुराना बताया जा रहा मंदिर
खड़े हनुमान मंदिर को करीब 170 साल पुराना बताया जा रहा है। पुरातत्व विशेषज्ञों ने प्रतिमा के निर्माण में इस्तेमाल पत्थर और इसकी शिल्पकला को लेकर भी महत्वपूर्ण बातें कही हैं। विक्रम विश्वविद्यालय से जुड़े पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. डॉ. रमण सोलंकी के मुताबिक प्रतिमा मालवा के बेसाल्ट पत्थर से बनी हो सकती है और इसकी शिल्प परंपरा परमार काल से जुड़ने की संभावना है। हालांकि प्रतिमा की वास्तविक उम्र की पुष्टि के लिए वैज्ञानिक जांच जरूरी है।
कुछ रिपोर्टों में इसे करीब 1000 साल पुरानी होने की संभावना भी बताई गई है, लेकिन इसे अभी अंतिम ऐतिहासिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
अब स्कैनिंग रिपोर्ट बताएगी आगे क्या होगा
प्रतिमा के आधार और जमीन के भीतर उसकी स्थिति को समझने के लिए तकनीकी जांच और स्कैनिंग की तैयारी की जा रही है। प्रशासन अब विशेषज्ञों की सलाह के बाद ही आगे की कार्रवाई करना चाहता है, ताकि स्थानांतरण के दौरान प्रतिमा को कोई नुकसान न पहुंचे।
प्रशासन की योजना प्रतिमा को दूसरी जगह स्थापित करने की है, जबकि श्रद्धालुओं और कुछ संगठनों की मांग है कि खड़े हनुमान को मौजूदा स्थान से न हटाया जाए। ऐसे में यह मामला फिलहाल सड़क चौड़ीकरण, धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक विरासत तीनों के बीच संतुलन की चुनौती बन गया है।