ईरान-इजरायल जंग से दहशत, शेयर बाजार में भूचाल; निवेशकों के लाखों करोड़ रुपये डूबे

मध्य पूर्व में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब दुनिया भर के शेयर बाजारों पर साफ दिखाई देने लगा है। युद्ध की आशंकाओं, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के चलते निवेशकों में घबराहट बढ़ गई है। इसका नतीजा यह हुआ कि एशिया से लेकर अमेरिका तक शेयर बाजारों में भारी बिकवाली देखने को मिली।

सोमवार को भारतीय शेयर बाजार भी इस दबाव से अछूता नहीं रहा। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में करीब 1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। आईटी, वित्तीय सेवाएं और मिडकैप शेयरों में सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला।

तेल की कीमतों ने बढ़ाई चिंता

बाजार की सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं। ईरान-इजरायल संघर्ष के कारण वैश्विक आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बढ़ी है। ब्रेंट क्रूड 96 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जबकि कई विश्लेषकों का मानना है कि यदि तनाव और बढ़ा तो कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं।

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में तेल महंगा होने से महंगाई, व्यापार घाटे और रुपये पर दबाव बढ़ने की आशंका है। यही वजह है कि निवेशकों ने जोखिम वाले शेयरों से दूरी बनानी शुरू कर दी है।

किन शेयरों पर सबसे ज्यादा असर?

बाजार में सबसे ज्यादा दबाव आईटी, बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं और एविएशन सेक्टर पर देखा गया। बढ़ती तेल कीमतों का सीधा असर एयरलाइंस कंपनियों की लागत पर पड़ता है, जबकि वैश्विक अनिश्चितता के कारण आईटी और वित्तीय शेयरों में बिकवाली बढ़ जाती है।

दूसरी ओर, रक्षा, ऊर्जा और कुछ कमोडिटी कंपनियों के शेयर अपेक्षाकृत मजबूत बने रहे क्योंकि युद्ध की स्थिति में इन क्षेत्रों की मांग बढ़ने की संभावना रहती है।

दुनिया भर के बाजारों में हड़कंप

भारत ही नहीं, दक्षिण कोरिया, जापान और अन्य एशियाई बाजारों में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई। दक्षिण कोरिया का कोस्पी इंडेक्स कई वर्षों की सबसे बड़ी गिरावट में फिसल गया, जबकि जापान का निक्केई भी भारी दबाव में रहा। अमेरिकी बाजारों में भी निवेशकों ने बड़े पैमाने पर मुनाफावसूली की।

सुरक्षित निवेश की ओर बढ़ रहे निवेशक

जब भी दुनिया में युद्ध या भू-राजनीतिक संकट बढ़ता है, निवेशक सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख करते हैं। इस बार भी सोना, डॉलर और ऊर्जा से जुड़े एसेट्स में निवेश बढ़ने की चर्चा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मध्य पूर्व का संकट लंबा खिंचता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका असर और गहरा हो सकता है।

क्या आगे भी रहेगा दबाव?

विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में बाजार की दिशा काफी हद तक मध्य पूर्व की स्थिति और तेल कीमतों पर निर्भर करेगी। यदि संघर्ष बढ़ता है तो निवेशकों की चिंता और बढ़ सकती है, जबकि किसी कूटनीतिक समाधान की स्थिति में बाजारों में राहत देखने को मिल सकती है।

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