गणेशजी 10 दिन ही क्यों विराजते हैं? अनंत चतुर्दशी पर क्यों होता है विसर्जन, जानिए क्या है मान्यता

सतना। डिजिटल डेस्क

गणेश चतुर्थी से शुरू होने वाला गणेशोत्सव अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश प्रतिमा के विसर्जन के साथ संपन्न होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि गणपति बप्पा को 10 दिनों तक ही क्यों विराजित किया जाता है और अनंत चतुर्दशी को ही विदाई क्यों दी जाती है? इसके पीछे पौराणिक कथाओं के साथ गहरी धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं।

महाभारत लेखन से जुड़ी है 10 दिनों की मान्यता

गणेशजी के 10 दिनों तक विराजने को लेकर सबसे प्रचलित मान्यता महर्षि वेदव्यास और महाभारत की कथा से जुड़ी है। कहा जाता है कि महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की पूरी कथा गणेशजी को सुनाई और गणेशजी ने उसे लिखने का कार्य किया।

मान्यता के अनुसार, गणेशजी ने महाभारत लिखने का काम लगातार किया। इस दौरान वेदव्यास कथा सुनाते रहे और गणेशजी उसे लिपिबद्ध करते रहे। यह कार्य 10 दिनों तक चला।

कहा जाता है कि दस दिनों तक लगातार लेखन करने के बाद गणेशजी के शरीर का तापमान बढ़ गया था। वेदव्यास ने उनके शरीर पर मिट्टी का लेप किया, जिससे उन्हें ठंडक मिली। इसी मान्यता को गणेशजी के 10 दिनों तक विराजने की परंपरा से जोड़ा जाता है।

हालांकि, गणेशोत्सव के 10 दिनों की यह व्याख्या लोकप्रिय धार्मिक मान्यता है। अलग-अलग धार्मिक परंपराओं और ग्रंथों में गणेशोत्सव से जुड़ी कथाओं और अनुष्ठानों की व्याख्या अलग-अलग मिलती है।

गणेश चतुर्थी से शुरू होता है उत्सव

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। इसी दिन श्रद्धालु घरों और सार्वजनिक पंडालों में गणेशजी की प्रतिमा स्थापित करते हैं।

इसके बाद कई परिवार और सार्वजनिक आयोजन समितियां अपनी परंपरा के अनुसार गणेशजी को डेढ़ दिन, तीन दिन, पांच दिन, सात दिन या पूरे 10 दिनों तक विराजित करती हैं। इसलिए हर जगह 10 दिन का ही विसर्जन हो, यह आवश्यक नहीं है।

पूरे 10 दिनों तक चलने वाला उत्सव अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन के साथ संपन्न होता है।

अनंत चतुर्दशी का क्या है महत्व

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अनंत चतुर्दशी कहा जाता है। यह दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की उपासना के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

इसी दिन गणेश प्रतिमा के विसर्जन की परंपरा होने के कारण गणेशोत्सव का समापन भी अनंत चतुर्दशी से जुड़ गया है। श्रद्धालु पूजा-अर्चना के बाद गणेशजी को श्रद्धापूर्वक विदाई देते हैं और प्रतिमा का विसर्जन करते हैं।

आखिर मूर्ति का विसर्जन क्यों?

गणेशजी की प्रतिमा का विसर्जन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन और प्रकृति के चक्र का प्रतीक भी माना जाता है।

मिट्टी से बनी प्रतिमा स्थापना के साथ एक रूप धारण करती है और विसर्जन के बाद उसी प्रकृति में वापस मिल जाती है। धार्मिक दृष्टि से इसे इस भाव से देखा जाता है कि संसार में जो कुछ आकार लेता है, उसका अंततः प्रकृति में विलय होता है।

गणेशजी को घर बुलाना और फिर उन्हें विदा करना भक्त और भगवान के बीच भावनात्मक संबंध को भी दर्शाता है। विसर्जन के समय श्रद्धालु उनसे परिवार में सुख, समृद्धि, बुद्धि और शुभता बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं।

विसर्जन में छिपा है बड़ा संदेश

गणेश विसर्जन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश अनासक्ति से भी जोड़ा जाता है। भक्त कुछ दिनों तक गणेशजी की प्रतिमा को पूरे प्रेम और श्रद्धा से अपने बीच रखते हैं, लेकिन निर्धारित समय आने पर उसी श्रद्धा के साथ उन्हें विदा भी करते हैं।

यानी उत्सव का भाव केवल भगवान को अपने पास रखने का नहीं, बल्कि यह स्वीकार करने का भी है कि आगमन के बाद प्रस्थान प्रकृति का नियम है।

इसीलिए विसर्जन के दौरान माहौल भावुक होने के बावजूद भक्तों के बीच एक विश्वास बना रहता है कि गणपति बप्पा अगले वर्ष फिर आएंगे।

गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ।

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