Gen-Z पर मोहन भागवत का दांव, क्या BJP को मिलेगा युवा कनेक्ट

RSS प्रमुख मोहन भागवत ने 6 अगस्त 2026 को मुंबई में India International Movement to Unite Nations (IIMUN) के कार्यक्रम में Gen-Z और Gen-Alpha के करीब 2,000 युवाओं से संवाद किया। कार्यक्रम में 15 से 19 वर्ष की उम्र के छात्र शामिल हुए थे। यह संवाद ऐसे समय हुआ जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन और उस पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म है। भागवत ने युवाओं की शिकायतों को खारिज करने के बजाय उन्हें सुनने और संवाद की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि Gen-Z के सवालों के पीछे वजह है और शिक्षा व्यवस्था में काफी कुछ सुधार की जरूरत है। उनके मुताबिक अगर लोगों की बात नहीं सुनी जाती तो लोकतंत्र में आंदोलन भी संवाद का एक माध्यम बन सकता है।

‘Gen-Z हमारे अपने लोग हैं, एंटी-नेशनल नहीं’

भागवत के बयान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा युवाओं को लेकर था। उन्होंने कहा कि अगर Gen-Z किसी मुद्दे को लेकर प्रदर्शन करता है तो उसे एंटी-नेशनल नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे देश की अपनी अगली पीढ़ी हैं। उन्होंने कहा कि युवाओं के साथ संवाद और अपनापन जरूरी है। उन्‍होंने पुरानी और नई पीढ़ी की सोच में अंतर बताते हुए कहा कि उनकी पीढ़ी में युवा बड़ों की बात स्वीकार कर लेते थे, जबकि आज की Gen-Z सवाल करती है और logical answers चाहती है। यही बात इस पूरे संवाद को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है।

भागवत का संदेश BJP से अलग क्यों दिखाई दिया

हाल के छात्र आंदोलन के दौरान BJP से जुड़े कुछ नेताओं की भाषा काफी आक्रामक रही थी। विपक्ष ने इसी विरोधाभास को पकड़ लिया।NCP (SP) ने सवाल उठाया कि जब भागवत Gen-Z को अपना और ईमानदार बता रहे हैं, तो BJP के कुछ नेताओं ने उन्हीं प्रदर्शनकारी युवाओं पर गंभीर आरोप क्यों लगाए थे। पार्टी ने इसे BJP और RSS के “double standards” का उदाहरण बताया।

कांग्रेस ने भी इसी सवाल को आगे बढ़ाया।

प्रियंका गांधी ने कहा कि Gen-Z को मोहन भागवत के किसी “certificate” की जरूरत नहीं है। वहीं KC वेणुगोपाल ने कहा कि अगर भागवत वास्तव में युवाओं की चिंता करते हैं तो उन्हें केंद्रीय गृह मंत्री से जवाब मांगना चाहिए।

BJP में भागवत के सुर का स्वागत

दिलचस्प बात यह है कि भागवत के बयान पर BJP की तरफ से पूरी तरह विरोध नहीं आया। BJP सांसद कंगना रनौत ने भागवत के युवा संवाद का स्वागत किया और कहा कि देश के युवा उसकी संस्कृति और विरासत के ambassadors बन रहे हैं। पश्चिम बंगाल के मंत्री दिलीप घोष ने भी भागवत को युवा पीढ़ी का मार्गदर्शक बताते हुए उनके हस्तक्षेप का समर्थन किया। यानी भागवत के संदेश को BJP के भीतर कम-से-कम सार्वजनिक स्तर पर स्वीकार्यता मिली है।

क्या संघ BJP के लिए ‘सेतु’ बन रहा है

यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है। इसे सीधे तौर पर यह कहना कि “संघ ने BJP और Gen-Z के बीच ब्रिज बना दिया”, अभी तथ्यात्मक निष्कर्ष होगा। लेकिन घटनाक्रम यह संकेत जरूर देता है कि संघ की तरफ से युवा पीढ़ी के साथ संवाद बढ़ाने और उनकी नाराजगी को समझने की कोशिश हो रही है।

एक तरफ BJP के सामने युवा आंदोलन, शिक्षा, रोजगार और परीक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दे हैं। दूसरी तरफ Gen-Z सोशल मीडिया के दौर की ऐसी पीढ़ी है जो पारंपरिक राजनीतिक भाषणों के बजाय सवाल और जवाब चाहती है। भागवत ने इसी बिंदु को पकड़ने की कोशिश की है।

उनका यह कहना कि युवा सवाल करते हैं और तार्किक जवाब चाहते हैं, संघ के पारंपरिक संवाद मॉडल को नई पीढ़ी की भाषा से जोड़ने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है।

विपक्ष ने भी भागवत के संदेश में राजनीतिक अवसर देखा

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भागवत के बयान का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि सरकार का विरोध करना देश का विरोध करना नहीं है और कई बार सरकार की गलतियों को सुधारने के लिए विरोध जरूरी होता है।

दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के रामगोपाल यादव ने तंज कसते हुए कहा कि जब BJP सरकार Gen-Z से चुनौती महसूस कर रही है तो क्या उसने स्थिति संभालने के लिए मोहन भागवत को भेजा है।

यानी एक ही बयान को सत्ता पक्ष ने संवाद के रूप में देखा, जबकि विपक्ष ने इसे BJP की राजनीतिक परेशानी के संकेत के तौर पर इस्तेमाल किया।

शशि थरूर ने भी 2029 की तरफ किया इशारा

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा कि राजनेताओं को युवाओं की बात सुननी और उनसे संवाद करना चाहिए। उन्होंने Gen-Z और Gen-Alpha को भविष्य की राजनीति में महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि 2029 के चुनाव में युवा सबसे बड़ा single voting bloc बन सकते हैं।

यही वह बिंदु है जहां Gen-Z का मुद्दा केवल छात्र आंदोलन से निकलकर चुनावी राजनीति का विषय बन जाता है।

संघ के लिए भी यह सिर्फ BJP का सवाल नहीं

संघ की चिंता को केवल BJP के चुनावी फायदे के नजरिए से देखना भी अधूरा होगा। RSS की अपनी कार्यपद्धति में लंबे समय से व्यक्तिगत संपर्क और संवाद को महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। ऐसे में Gen-Z जैसी नई पीढ़ी के साथ संवाद करना संगठन के लिए सामाजिक पहुंच का भी हिस्सा हो सकता है। लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियां इसे ज्यादा महत्वपूर्ण बना देती हैं।

युवा अगर शिक्षा, रोजगार, परीक्षा व्यवस्था और सरकारी जवाबदेही को लेकर सवाल उठा रहे हैं, तो किसी भी राजनीतिक-सामाजिक संगठन के लिए उन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

असली परीक्षा अब BJP की है

मोहन भागवत का संवाद एक सॉफ्ट मैसेज जरूर देता है, लेकिन उसका राजनीतिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि BJP और सरकार व्यवहार में युवाओं के सवालों पर क्या करती हैं।

अगर शिक्षा, परीक्षा प्रणाली, रोजगार और पुलिस कार्रवाई जैसे मुद्दों पर ठोस कदम दिखाई देते हैं, तो भागवत का संवाद BJP और युवा वर्ग के बीच दूरी कम करने में मदद कर सकता है। लेकिन अगर बयान और जमीनी कार्रवाई में अंतर बना रहा, तो विपक्ष का “double standards” वाला आरोप और मजबूत हो सकता है।


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