उज्जैन। डिजिटल डेस्क
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद में अहंकार को लेकर युवाओं को महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य कई बार अहंकार में यह मान बैठता है कि दुनिया उसकी इच्छा और नियंत्रण के अनुसार चलती है, जबकि प्रकृति अपने नियमों से चलती है।
मनुष्य को हो जाता है सब कुछ अपने नियंत्रण में होने का भ्रम
डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि मनुष्य अपने अहंकार में यह मानने लगता है कि हर चीज उसकी इच्छा के मुताबिक होनी चाहिए और चारों ओर उसी की सत्ता चलती है। लेकिन यह वास्तविकता नहीं, बल्कि एक गलतफहमी है।
उन्होंने समझाने के लिए सूर्य का उदाहरण दिया। भागवत ने कहा कि सूर्य का उदय हुआ है तो उसका अस्त होना भी निश्चित है। कोई व्यक्ति सूर्य के अस्त होने को अपनी इच्छा से रोक नहीं सकता। प्रकृति अपने शाश्वत नियमों के अनुसार चलती है।
‘आप मानें या न मानें, सूरज उगेगा और डूबेगा’
भागवत ने कहा कि किसी व्यक्ति का विश्वास या अविश्वास प्रकृति के नियमों को नहीं बदल सकता। सूर्य के अस्तित्व को लेकर कोई कुछ भी माने, लेकिन उसका उगना और डूबना निश्चित है।
इसी उदाहरण के जरिए उन्होंने अहंकार की सीमा समझाने की कोशिश की। उनके मुताबिक व्यक्ति जब यह मान लेता है कि हर परिस्थिति उसके नियंत्रण में है, तभी उसके भीतर गलतफहमी पैदा होती है कि दुनिया भी उसकी इच्छा के अनुसार चलेगी।
युवा धर्म संसद में करीब 1700 युवाओं की भागीदारी
उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद में देशभर से करीब 1700 Gen Z युवा शामिल हुए। भागवत ने कहा कि यह देखकर खुशी होती है कि युवा पीढ़ी धर्म को लेकर चर्चा कर रही है।
उन्होंने धर्म को केवल पूजा-पद्धति या बुजुर्गों तक सीमित मानने की धारणा से अलग बताया। उनके अनुसार धर्म को जीवन और आचरण से जोड़कर समझने की जरूरत है।
धर्म और रिलीजन में अंतर पर भी बोले भागवत
अपने संबोधन में भागवत ने धर्म और ‘रिलीजन’ के बीच अंतर पर भी बात की। उन्होंने कहा कि भारतीय संदर्भ में धर्म का अर्थ केवल किसी पंथ या पूजा-पद्धति से नहीं है, बल्कि यह कर्तव्य, सदाचार और जीवन के आचरण से जुड़ा व्यापक विचार है।
उन्होंने युवाओं से धर्म को केवल चर्चा का विषय न बनाकर उसे जीवन में उतारने की बात कही।