छिंदवाड़ा। सतपुड़ा की पहाड़ियों में बारिश का मौसम है। पहाड़ों से झरने उतर रहे हैं, जंगल धुंध से ढके हैं और चट्टानों पर पानी की धार लगातार बह रही है। इसी मौसम में हजारों-लाखों श्रद्धालु एक ऐसे रास्ते पर निकल पड़ते हैं, जहां सफर आसान नहीं है। कहीं ऊंची पहाड़ी है, कहीं गहरी ढलान, कहीं नदी-नाला और कहीं चट्टानों के बीच से निकलता संकरा रास्ता। फिर भी कदम रुकते नहीं। क्योंकि इस कठिन रास्ते के आखिर में है वह जगह, जिसे स्थानीय आस्था में नागराज की दुनिया और नागलोक का द्वार कहा जाता है। यह है पचमढ़ी की नागद्वारी।यहां भगवान शिव से जुड़ी एक कथा सुनाई जाती है। नागराज से जुड़ी मान्यताएं हैं। पद्मशेष नागदेवता की पूजा होती है। एक लोककथा में संतान की मन्नत मांगने वाली महिला का जिक्र आता है। और सबसे खास बात—इस पूरी आस्था तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को सतपुड़ा के कठिन पहाड़ी रास्तों से गुजरना पड़ता है।
नागद्वारी आखिर है क्या
नागद्वारी पचमढ़ी के सतपुड़ा क्षेत्र में स्थित एक धार्मिक स्थल है, जहां नागदेवता की पूजा की जाती है। नर्मदापुरम जिला प्रशासन भी नागद्वारी मेले को पचमढ़ी से जोड़ता है और यहां नागदेवता की पूजा को इसका प्रमुख धार्मिक महत्व बताता है। महाराष्ट्र और नागपुर क्षेत्र से भी श्रद्धालुओं के आने का उल्लेख सरकारी जानकारी में मिलता है।
छिंदवाड़ा जिला प्रशासन के अनुसार नागद्वारी यात्रा हर साल श्रावण मास में नागपंचमी के अवसर पर अगस्त के आसपास होती है। यात्रा का एक मार्ग काजरी गांव से होकर गुजरता है और इसकी व्यवस्था छिंदवाड़ा तथा होशंगाबाद यानी वर्तमान नर्मदापुरम जिले के प्रशासन द्वारा मिलकर की जाती है।
यात्रा का दूसरा प्रमुख रास्ता पचमढ़ी से होकर जाता है। श्रद्धालु पचमढ़ी पहुंचकर धूपगढ़ से पैदल यात्रा शुरू करते हैं। आगे गणेश टेकड़ी, काजली, पश्चिम द्वार और पद्मशेष द्वार जैसे पड़ाव आते हैं। यानी नागद्वारी कोई ऐसा मंदिर नहीं, जहां गाड़ी से पहुंचकर कुछ मिनट में दर्शन कर वापस लौट आया जाए। यहां रास्ता ही यात्रा का हिस्सा है।
नागद्वारी को नागलोक का द्वार क्यों कहते हैं
नागद्वारी के नाम के साथ ही एक रहस्य जुड़ा हुआ है। स्थानीय धार्मिक मान्यता में इसे नागराज की दुनिया माना जाता है। पहाड़ों के बीच मौजूद गुफाओं और वहां नागदेवता से जुड़े धार्मिक प्रतीकों के कारण श्रद्धालुओं के बीच यह विश्वास मजबूत हुआ कि यह स्थान नागलोक से जुड़ा हुआ है। इसी वजह से इसे नागद्वारी यानी नागों की दुनिया का द्वार कहा जाता है। यहां की कई कथाएं पीढ़ियों से सुनाई जाती रही हैं, लेकिन उन्हें ऐतिहासिक घटना या वैज्ञानिक तथ्य की तरह पेश करना सही नहीं होगा।
जब भस्मासुर के पीछे दौड़ने पर शिव पहुंचे नागद्वारी
कहानी भगवान शिव से शुरू होती है। लोकमान्यता के अनुसार भस्मासुर ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उसे ऐसा वरदान दिया कि वह जिसके सिर पर हाथ रखेगा, वह भस्म हो जाएगा। लेकिन वरदान मिलते ही भस्मासुर के मन में अहंकार पैदा हो गया। उसने सोचा कि क्यों न इस वरदान को स्वयं भगवान शिव पर ही आजमाया जाए। इसके बाद वह शिव के पीछे दौड़ पड़ा। भगवान शिव संकट में पड़ गए। नागद्वारी से जुड़ी स्थानीय किंवदंती के अनुसार भस्मासुर से बचने के दौरान भगवान शिव ने नागराज को नागद्वारी में छोड़ दिया और स्वयं चौरागढ़ की ओर चले गए। छिंदवाड़ा जिला प्रशासन की वेबसाइट भी नागद्वारी के परिचय में इस कथा को किंवदंती के रूप में दर्ज करती है। यही कथा नागद्वारी को नागराज की भूमि और नागलोक के द्वार के रूप में देखने वाली आस्था का एक आधार मानी जाती है।
पद्मशेष नागदेवता के दर्शन के लिए क्यों उमड़ते हैं श्रद्धालु

नागद्वारी की आस्था का केंद्र हैं पद्मशेष नागदेवता। श्रद्धालुओं के लिए यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण क्षण वह होता है, जब कठिन पहाड़ी रास्ता पार करने के बाद वे नागदेवता के दर्शन तक पहुंचते हैं। यही वजह है कि बरसात में भी यात्रा रुकती नहीं। आधिकारिक विवरण के अनुसार यहां तक पहुंचने के रास्ते में सतपुड़ा की ऊंची पहाड़ियां, झरने, नदियां और छोटे-बड़े नाले आते हैं। यात्रा पैदल होती है और घोड़े-खच्चर जैसी सुविधा उपलब्ध नहीं होने की जानकारी भी दी गई है। यानी श्रद्धालु अपने पैरों पर ही इस यात्रा को पूरा करते हैं। किसी के हाथ में पूजा की सामग्री है, किसी के कंधे पर सामान और किसी की जुबान पर लगातार भगवान का नाम। बारिश रास्ता कठिन करती है, लेकिन आस्था कदमों को आगे बढ़ाती रहती है।
एक महिला की मन्नत से जुड़ी है काजल वाली कहानी
नागद्वारी की सबसे दिलचस्प लोककथाओं में एक कहानी काजली गांव की महिला से जुड़ी है। किंवदंती के अनुसार, इस महिला ने संतान प्राप्ति के लिए नागराज से मन्नत मांगी थी। उसने संकल्प लिया कि उसकी इच्छा पूरी होने पर वह नागराज को काजल लगाएगी। कहानी के मुताबिक उसकी मनोकामना पूरी हुई। वह अपना संकल्प पूरा करने नागद्वारी पहुंची। लेकिन वहां नागराज का विशाल स्वरूप देखकर वह घबरा गई और मूर्छित हो गई। काजल लगाने की उसकी मन्नत पूरी नहीं हो सकी। इसके बाद, लोककथा के अनुसार, नागराज ने छोटा रूप धारण किया और महिला ने उन्हें काजल लगाया। छिंदवाड़ा जिला प्रशासन की वेबसाइट पर नागद्वारी की जानकारी में यह कहानी भी दर्ज है। यही कथा यहां काजल लगाने की परंपरा और संतान प्राप्ति से जुड़ी मान्यता को समझाने के लिए सुनाई जाती है।
गुफाओं के भीतर छिपी है नागद्वारी की असली खूबसूरती
नागद्वारी का आकर्षण सिर्फ धार्मिक कथाओं में नहीं है। इसकी सबसे बड़ी खासियत है इसका प्राकृतिक भूगोल। पहाड़ों के बीच बनी गुफाएं, बारिश में जीवंत हो उठते झरने, चट्टानों से गिरता पानी और चारों तरफ फैला जंगल इस यात्रा को बाकी धार्मिक यात्राओं से अलग बनाते हैं। छिंदवाड़ा जिला प्रशासन के विवरण में नागद्वारी की मुख्य गुफा की लंबाई करीब 35 फीट बताई गई है। रास्ते में बड़ी गुफाओं में यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था का भी उल्लेख है। यात्रा मार्ग में स्वर्गद्वार भी महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। दो पहाड़ियों के बीच सीढ़ियों के जरिए यहां तक पहुंचने की व्यवस्था की जाती है। ऐसे में जब कोई श्रद्धालु बारिश के बीच पहाड़ी रास्ते से गुजरता हुआ गुफा तक पहुंचता है, तो उसके सामने सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं होता। उसके सामने प्रकृति और आस्था दोनों एक साथ खड़े होते हैं।
तीन दिन का सफर, करीब 30 किलोमीटर का रास्ता
नागद्वारी यात्रा को लेकर सरकारी जानकारी में एक अलग महत्वपूर्ण तथ्य भी सामने आता है। छिंदवाड़ा जिला प्रशासन के अनुसार एक मार्ग से यह यात्रा करीब 30 किलोमीटर की है और इसे पूरा करने में लगभग तीन दिन लगते हैं। इस दौरान श्रद्धालु सतपुड़ा की पहाड़ियों, झरनों, नदियों और नालों को पार करते हैं। वहीं पचमढ़ी वाला मार्ग धूपगढ़ से शुरू होता है और अपने अलग पड़ावों के साथ नागद्वारी तक पहुंचता है। इसलिए नागद्वारी की दूरी बताते समय अलग-अलग मार्गों को एक ही आंकड़े में नहीं मिलाना चाहिए। यात्रा की कठिनाई का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सामान्य वाहन यात्रा के बाद भी अंतिम धार्मिक मार्ग का बड़ा हिस्सा पैदल तय करना पड़ता है।
नागपंचमी पर ही क्यों बढ़ जाती है यहां की रौनक
नागद्वारी की धार्मिक पहचान सीधे नागपंचमी से जुड़ी हुई है। श्रावण मास में नागपंचमी के आसपास यह यात्रा आयोजित होती है। यही वह समय होता है जब नागदेवता की पूजा देश के अलग-अलग हिस्सों में की जाती है और पचमढ़ी की नागद्वारी में भी श्रद्धालुओं की संख्या तेजी से बढ़ती है। नर्मदापुरम जिला प्रशासन नागद्वारी मेले को पचमढ़ी में होने वाला आयोजन बताता है और नागदेवता की पूजा को इसका मुख्य धार्मिक महत्व बताता है। महाराष्ट्र और नागपुर क्षेत्र से आने वाले श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या भी इस यात्रा को खास बनाती है।
तो क्या नागद्वारी सच में नागलोक का द्वार है
यह सवाल शायद सबसे ज्यादा जिज्ञासा पैदा करता है। धार्मिक मान्यता कहती है कि नागद्वारी नागराज की दुनिया है। लेकिन उपलब्ध सरकारी और विश्वसनीय स्रोत इसे धार्मिक मान्यता और किंवदंती के रूप में ही बताते हैं। नागलोक के किसी वास्तविक भौतिक संसार का वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसी तरह कालसर्प दोष से मुक्ति, संतान प्राप्ति या मनोकामना पूरी होने जैसी बातें भी श्रद्धालुओं के विश्वास का हिस्सा हैं। इनका महत्व आस्था में है, विज्ञान में प्रमाणित परिणाम के रूप में नहीं।