कैंची धाम/वृंदावन। डिजिटल डेस्क
नीम करौली बाबा जिन्हें उनके अनुयायी महाराजजी के नाम से भी पुकारते हैं, 20वीं सदी के उन भारतीय संतों में शामिल हैं जिनकी लोकप्रियता भारत की सीमाओं से निकलकर पश्चिमी दुनिया तक पहुंची। उनका जीवन भक्ति, सेवा और साधना से जुड़ी कथाओं के साथ-साथ कई ऐसे प्रसंगों से भी घिरा है, जिनका आधार भक्तों के संस्मरण और मौखिक परंपराएं हैं।
नीम करौली बाबा कौन थे
बाबा का जन्मनाम आम तौर पर लक्ष्मण नारायण शर्मा बताया जाता है। उपलब्ध सरकारी और जीवनी स्रोत उनके जन्म का समय करीब 1900 बताते हैं। उनके जन्मस्थान को लेकर पुराने स्रोतों में मतभेद मिलता रहा है, लेकिन वर्तमान में फर्रुखाबाद जिला प्रशासन की वेबसाइट उन्हें फिरोजाबाद में जन्मा बताती है और नीब करोरी धाम को उनके तपस्थल से जोड़ती है।
उनके जीवन की शुरुआती जानकारी बहुत सीमित और अलग-अलग स्रोतों पर आधारित है। यही वजह है कि उनकी जीवनी लिखने वाले कई स्रोत यह मानते हैं कि उनके जीवन के बारे में तथ्य कम और उनसे जुड़ी कथाएं ज्यादा हैं। पेंगुइन इंडिया ने रामदास की पुस्तक Miracle of Love के संदर्भ में भी इसी समस्या की ओर ध्यान दिलाया है।
यानी नीम करौली बाबा की कहानी को समझते समय यह फर्क बनाए रखना जरूरी है कि कौन-सी बात दस्तावेजी स्रोत से आती है और कौन-सी भक्तों की परंपरा से।
असली नाम नीम करौली नहीं था
उनका नाम जन्म के समय लक्ष्मी नारायण शर्मा रखा गया था। आगे चलकर वे अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग नामों से जाने गए। उन्हें लक्ष्मण दास समेत कई नामों से पुकारे जाने का उल्लेख मिलता है।
उनका सबसे प्रसिद्ध नाम नीब करोरी बाबा या नीम करौली बाबा बना।
यह नाम उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद क्षेत्र के नीब करोरी गांव से जुड़ा माना जाता है। फर्रुखाबाद जिला प्रशासन के अनुसार बाबा का तपस्थल शंकरा/संकिसा क्षेत्र के निकट नीब करोरी धाम के रूप में जाना जाता है। यहां प्राचीन हनुमान मंदिर और गुफा को उनकी साधना से जोड़ा जाता है।
आज लोकप्रिय नाम ‘नीम करौली बाबा’ है, जबकि ‘नीब करोरी बाबा’ को उनके नाम का अधिक निकट रूप माना जाता है। हालिया रिपोर्टों में भी इसी नाम को लेकर चर्चा हुई है।
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बचपन में शादी, फिर साधु जीवन
नीम करौली बाबा के शुरुआती जीवन के बारे में प्रचलित जीवनी के अनुसार उनका विवाह कम उम्र में हुआ था। कुछ स्रोत इसे करीब 11 वर्ष की उम्र बताते हैं। इसके बाद वे घर छोड़कर साधु के रूप में घूमने लगे। बाद में पिता के आग्रह पर वे घर लौटे और गृहस्थ जीवन भी जिया। उनके दो पुत्र और एक पुत्री होने का उल्लेख मिलता है।
यह पहलू उनके जीवन की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। लोकप्रिय छवि में उन्हें केवल एक संन्यासी संत के रूप में देखा जाता है, लेकिन उपलब्ध जीवनी सामग्री बताती है कि उन्होंने गृहस्थ जीवन और साधु जीवन दोनों का अनुभव किया।
बाद के वर्षों में उन्होंने फिर से भ्रमण और साधना का जीवन अपनाया और उत्तर भारत के अलग-अलग स्थानों से उनका संबंध जुड़ता गया।
नीब करोरी गांव और बाबा के नाम की कहानी
बाबा के नाम से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा रेलवे यात्रा की है।
भक्तों के संस्मरणों में बताया जाता है कि एक बार बाबा बिना टिकट ट्रेन में यात्रा कर रहे थे। उन्हें नीब करोरी के पास ट्रेन से उतार दिया गया। इसके बाद ट्रेन कथित रूप से आगे नहीं चली। स्थानीय लोगों के आग्रह पर बाबा को फिर ट्रेन में बैठाया गया और ट्रेन चल पड़ी। इसी प्रसंग को बाबा के ‘नीब करोरी बाबा’ नाम से जोड़ा जाता है।
हनुमान भक्ति बनी पहचान
नीम करौली बाबा की आध्यात्मिक पहचान का सबसे मजबूत पक्ष उनकी हनुमान भक्ति थी।
फर्रुखाबाद जिला प्रशासन भी नीब करोरी धाम का वर्णन करते हुए उन्हें हनुमान के भक्त और भक्तों द्वारा हनुमान का अवतार माने जाने वाले संत के रूप में प्रस्तुत करता है। यहां दो बातों में अंतर जरूरी है।
बाबा की हनुमान भक्ति एक स्थापित परंपरा है, जबकि उन्हें हनुमान का अवतार मानना धार्मिक आस्था का विषय है।
इसी कारण उनकी जीवनी में ‘हनुमान के अवतार’ को ऐतिहासिक तथ्य के रूप में लिखने के बजाय ‘भक्त उन्हें हनुमान का अवतार मानते हैं’ कहना ज्यादा उचित है।
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कैंची धाम से क्यों जुड़ा बाबा का नाम
नीम करौली बाबा की सबसे प्रसिद्ध पहचान आज कैंची धाम से जुड़ी है।
उत्तराखंड के नैनीताल जिले की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार कैंची धाम नैनीताल-अल्मोड़ा मार्ग पर स्थित है। यह नैनीताल से करीब 17 किलोमीटर और भवाली से करीब 9 किलोमीटर दूर है। यहां बाबा नीब करौली महाराज का आश्रम है और हर वर्ष 15 जून को बड़ा मेला आयोजित होता है।
‘कैंची’ नाम को लेकर भी अक्सर गलतफहमी होती है।
सरकारी स्रोत के अनुसार इस स्थान का नाम सड़क के दो तीखे मोड़ों के कारण पड़ा। स्थानीय बोली में इन्हें कैंची कहा जाता है। इसका कैंची यानी scissors से कोई सीधा संबंध नहीं है।
आज कैंची धाम भारत के प्रमुख आध्यात्मिक स्थलों में गिना जाता है और बाबा की विरासत का सबसे प्रसिद्ध केंद्र है।
कैंची धाम कब बना
कैंची धाम के निर्माण को लेकर इंटरनेट पर अलग-अलग वर्ष मिलते हैं। कुछ स्रोत 1964 को निर्माण और हनुमान मंदिर से जोड़ते हैं, जबकि अन्य विवरण इससे पहले की गतिविधियों का उल्लेख करते हैं।
इसलिए इसे एक ही तारीख के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय यह कहना ज्यादा सुरक्षित है कि 1960 के दशक में कैंची क्षेत्र बाबा की प्रमुख आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र बना और 1960 के दशक के मध्य में यहां आश्रम एवं मंदिर परिसर का विकास हुआ।
यह सावधानी इसलिए भी जरूरी है क्योंकि बाबा की जीवनी से जुड़े कई विवरण बाद के संस्मरणों से आते हैं।
बाबा का संदेश क्या था
नीम करौली बाबा की लोकप्रियता केवल चमत्कारों की वजह से नहीं बनी।
उनसे जुड़ी शिक्षाओं में प्रेम, सेवा और ईश्वर-स्मरण को प्रमुख स्थान मिलता है। रामदास की आधिकारिक वेबसाइट भी उनके गुरु से जुड़ी शिक्षाओं को प्रेम और सेवा की दिशा में प्रस्तुत करती है।
बाबा की परंपरा से जुड़े संदेश को मोटे तौर पर इस तरह समझा जा सकता है—
- लोगों से प्रेम करो।
- जरूरतमंदों की सेवा करो।
- ईश्वर को याद रखो।
- भोजन और सहायता को सेवा का माध्यम बनाओ।
- अहंकार से दूर रहो।
- साधना को केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित न रखो।
यही सरलता उनकी शिक्षाओं की खास पहचान बनी।
बाबा से जुड़े चमत्कारों की कहानियां
नीम करौली बाबा की जीवनी का सबसे चर्चित हिस्सा उनके चमत्कारों से जुड़ी कहानियां हैं।
भक्तों ने उनके बारे में ऐसी अनेक घटनाएं सुनाई हैं जिनमें उन्हें भविष्य का आभास होने, दूर बैठे व्यक्ति की स्थिति जानने, बीमारी में सहायता करने या असंभव परिस्थितियों को बदल देने वाला बताया गया।
लेकिन इन कहानियों के साथ तथ्यात्मक सावधानी जरूरी है।
इनमें से अनेक घटनाएं भक्तों के संस्मरण, मौखिक परंपरा और आध्यात्मिक अनुभव हैं; इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित घटनाएं कहना उचित नहीं होगा।
रामदास की वेबसाइट पर भी बाबा से जुड़े व्यक्तिगत अनुभवों और संस्मरणों की एक बड़ी परंपरा मौजूद है।
इसलिए बाबा की कहानी का सबसे संतुलित तरीका यह है कि चमत्कारों को ‘भक्तों द्वारा सुनाई गई कथाओं’ के रूप में प्रस्तुत किया जाए।
रामदास से मुलाकात: जब बाबा की ख्याति पश्चिम तक पहुंची
नीम करौली बाबा की अंतरराष्ट्रीय पहचान में सबसे महत्वपूर्ण नाम है रामदास।
रामदास का मूल नाम रिचर्ड अल्पर्ट था। वे हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर थे। 1967 में भारत की यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात नीम करौली बाबा से हुई। रामदास की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार यही मुलाकात उनके जीवन में बड़ा परिवर्तन लेकर आई। बाबा ने उन्हें ‘रामदास’ नाम दिया, जिसका अर्थ भगवान का सेवक बताया गया है।
रामदास के अनुसार वे नवंबर 1967 से मार्च 1968 के बीच बाबा से जुड़े रहे और उनके साथ बिताया समय भले ही सीमित था, लेकिन उस अनुभव का उनके आगे के जीवन पर गहरा असर पड़ा।
‘Be Here Now’ और दुनिया तक पहुंची बाबा की शिक्षाएं
रामदास ने 1971 में Be Here Now पुस्तक प्रकाशित की।
रामदास की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार यह पुस्तक पश्चिमी दुनिया में ध्यान, योग और भारतीय आध्यात्मिक विचारों को लोकप्रिय बनाने वाली महत्वपूर्ण कृतियों में शामिल हुई और लाखों पाठकों तक पहुंची।
इस तरह नीम करौली बाबा ने स्वयं बड़े पैमाने पर प्रचार अभियान नहीं चलाया, लेकिन उनके शिष्य रामदास के जरिए उनके गुरु की शिक्षाएं अमेरिका और पश्चिमी दुनिया के आध्यात्मिक समुदायों तक पहुंचीं।
यही वह मोड़ था जब बाबा की पहचान भारतीय संत से आगे बढ़कर वैश्विक आध्यात्मिक विरासत का हिस्सा बनने लगी।
स्टीव जॉब्स का बाबा से क्या संबंध था
नीम करौली बाबा और स्टीव जॉब्स का नाम आज अक्सर एक साथ लिया जाता है।
लेकिन यहां एक बेहद महत्वपूर्ण तथ्य है—जॉब्स जब भारत आए थे, तब तक नीम करौली बाबा का सितंबर 1973 में निधन हो चुका था।
उपलब्ध जीवनी विवरण के अनुसार जॉब्स 1974 में भारत आए और बाबा से मिलने के उद्देश्य से कैंची आश्रम पहुंचे, लेकिन वहां उन्हें पता चला कि बाबा अब इस दुनिया में नहीं हैं।
इसलिए यह कहना गलत होगा कि जॉब्स ने कैंची धाम में बाबा से व्यक्तिगत मुलाकात की थी।
हां, जॉब्स की भारत यात्रा और नीम करौली बाबा से मिलने की उनकी इच्छा का उल्लेख कई स्रोतों में मिलता है। यह यात्रा उनकी आध्यात्मिक खोज का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
मार्क जुकरबर्ग तक कैसे पहुंची बाबा की कहानी
नीम करौली बाबा का नाम मार्क जुकरबर्ग से भी जुड़ा है।
2015 में भारत यात्रा के दौरान जुकरबर्ग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत में बताया था कि फेसबुक के शुरुआती कठिन दौर में स्टीव जॉब्स ने उन्हें भारत में नीम करौली बाबा के आश्रम जाने की सलाह दी थी। इसके बाद कैंची धाम से जुड़ा यह प्रसंग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खूब चर्चित हुआ।
यहां भी एक महत्वपूर्ण अंतर है—जुकरबर्ग की यात्रा बाबा से मिलने की यात्रा नहीं थी, क्योंकि बाबा का निधन 1973 में हो चुका था।
यानी जॉब्स और जुकरबर्ग के मामले में बाबा की शिक्षाओं और आश्रम की आध्यात्मिक विरासत का प्रभाव महत्वपूर्ण है, न कि बाबा के साथ उनकी व्यक्तिगत मुलाकात।
बाबा का अंतिम समय
नीम करौली बाबा ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष मुख्य रूप से उत्तर भारत के आश्रमों और भक्तों के बीच बिताए।
उनका निधन 11 सितंबर 1973 को वृंदावन में हुआ। रामदास की आधिकारिक वेबसाइट भी 11 सितंबर 1973 को बाबा के शरीर छोड़ने की तारीख के रूप में याद करती है।
जीवनी स्रोतों के अनुसार उनके अंतिम समय से जुड़ी घटनाओं में आगरा की यात्रा, स्वास्थ्य संबंधी परेशानी और मथुरा में तबीयत बिगड़ने के बाद वृंदावन ले जाने का उल्लेख मिलता है। कुछ स्रोत उनकी मृत्यु का समय लगभग रात 1:15 बजे बताते हैं।
उनकी समाधि वृंदावन आश्रम परिसर में स्थित है।
मृत्यु के बाद और बढ़ी लोकप्रियता
नीम करौली बाबा की मृत्यु के बाद उनकी लोकप्रियता खत्म नहीं हुई, बल्कि समय के साथ बढ़ती गई।
कैंची धाम आज भी श्रद्धालुओं के लिए बड़ा आध्यात्मिक केंद्र है। उत्तराखंड सरकार के अनुसार यहां हर वर्ष 15 जून को बड़ा मेला आयोजित होता है, जिसमें देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं।
फर्रुखाबाद का नीब करोरी धाम भी बाबा की आध्यात्मिक यात्रा से जुड़ा प्रमुख स्थल है। जिला प्रशासन के अनुसार बाबा का तपस्थल, प्राचीन हनुमान मंदिर और गुफा यहां की प्रमुख पहचान हैं।
इस तरह बाबा की विरासत दो महत्वपूर्ण भौगोलिक केंद्रों—नीब करोरी और कैंची धाम—के साथ खास तौर पर जुड़ी दिखाई देती है।
नीम करौली बाबा की कहानी का असली अर्थ क्या है
नीम करौली बाबा की कहानी को केवल चमत्कारों की कहानी मानना उनकी विरासत का एक छोटा हिस्सा देखने जैसा होगा।
उनका जीवन एक ऐसे संत की कहानी है जिसके बारे में दस्तावेजी जानकारी सीमित है, लेकिन जिसकी आध्यात्मिक परंपरा उसके भक्तों, शिष्यों और आश्रमों के माध्यम से बहुत दूर तक पहुंची।
एक ओर उनके जीवन में गृहस्थ जीवन, साधना और भ्रमण के प्रसंग हैं। दूसरी ओर कैंची धाम जैसी जगह उनकी स्थायी पहचान बन गई। रामदास के माध्यम से उनकी शिक्षाएं पश्चिमी दुनिया तक पहुंचीं और बाद में स्टीव जॉब्स तथा मार्क जुकरबर्ग जैसे नामों के साथ उनका आश्रम वैश्विक चर्चा में आया।
लेकिन इन सबके बीच उनकी सबसे सरल और टिकाऊ पहचान वही रही—प्रेम, सेवा और ईश्वर-स्मरण।
शायद यही वजह है कि 1973 में शरीर छोड़ने के पांच दशक से अधिक समय बाद भी नीम करौली बाबा का नाम भारत के आध्यात्मिक नक्शे से लेकर दुनिया भर के आध्यात्मिक विमर्श में मौजूद है।