हथकरघा दिवस: सतना का वह गांव, जहां 150 घरों में आज भी घूमता है गांधी का चरखा

सतना। देशभर में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया जा रहा है, लेकिन मध्य प्रदेश के सतना जिले का एक गांव आज भी महात्मा गांधी के स्वदेशी और स्वावलंबन के विचारों को अपने जीवन में जी रहा है। रामनगर ब्लॉक के सुलखमा गांव में करीब 150 परिवार ऐसे हैं, जिनके घरों में आज भी चरखे की आवाज गूंजती है। यहां चरखा सिर्फ विरासत नहीं, बल्कि रोजी-रोटी का जरिया भी है।

73 साल बाद भी नहीं टूटी चरखे से जुड़ी परंपरा

सतना जिला मुख्यालय से करीब 90 किलोमीटर दूर रामनगर विकासखंड का सुलखमा गांव आज भी महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन की याद दिलाता है। गांव की लगभग साढ़े तीन हजार आबादी में पाल समाज के डेढ़ सौ से अधिक परिवार चरखे और हथकरघे पर निर्भर हैं। यहां हर घर में चरखा केवल एक औजार नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही विरासत है।

महिलाओं के हाथों से तैयार होता है सूत

सुलखमा गांव में गांधी के चरखे पर सूत कातते ग्रामीण कारीगर

गांव की महिलाओं की दिनचर्या घर के कामकाज के बाद चरखे से शुरू होती है। वे भेड़ों की ऊन साफ कर उसे धुनती हैं और फिर चरखे पर सूत तैयार करती हैं। इसके बाद पुरुष उसी सूत से कंबल और अन्य ऊनी वस्त्र बुनते हैं। परिवार के लगभग सभी सदस्य इस पारंपरिक कार्य में अपनी भूमिका निभाते हैं।

10 से 15 दिन की मेहनत, फिर भी नहीं मिलता पूरा मेहनताना

सुलखमा के बुनकर बताते हैं कि एक कंबल तैयार करने में पूरे परिवार को 10 से 15 दिन तक मेहनत करनी पड़ती है। इसके बावजूद बाजार में एक कंबल की कीमत केवल 600 से 700 रुपये ही मिल पाती है। इतनी कम आय में परिवार का गुजारा मुश्किल हो जाता है।

‘बुजुर्गों से सीखा, अब बच्चे गांव छोड़ रहे’

गांव के बुनकर दुद्दी पाल बताते हैं कि चरखा चलाना उन्होंने अपने बुजुर्गों से सीखा था। पहले यही गांव की पहचान थी, लेकिन अब कम आमदनी के कारण नई पीढ़ी रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रही है।

वहीं सुसीता पाल कहती हैं कि शादी से पहले मायके में भी चरखा चलाती थीं और शादी के बाद ससुराल में भी यही काम कर रही हैं। परिवार के सभी सदस्य मेहनत करते हैं, लेकिन मेहनताना इतना कम मिलता है कि जीवनयापन मुश्किल हो जाता है।

सरकारी मदद का अब भी इंतजार

ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से वे चरखे और हथकरघे की परंपरा को जीवित रखे हुए हैं, लेकिन उन्हें आज तक कोई विशेष सरकारी सहायता या बाजार उपलब्ध नहीं हो सका। यदि प्रशिक्षण, आधुनिक विपणन और आर्थिक सहयोग मिले तो यह परंपरा न केवल बच सकती है, बल्कि कई परिवारों के लिए सम्मानजनक रोजगार का माध्यम भी बन सकती है।

हथकरघा दिवस पर क्यों खास है सुलखमा

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर जब देश पारंपरिक बुनकरों और हस्तशिल्प की बात कर रहा है, तब सुलखमा गांव इस बात का जीवंत उदाहरण है कि महात्मा गांधी का स्वदेशी और स्वावलंबन का सपना आज भी कुछ गांवों में सांस ले रहा है। जरूरत केवल इतनी है कि इस विरासत को संरक्षण और उचित बाजार मिल सके।

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