बालाघाट। धान की खेती को वैज्ञानिक तकनीकों से जोड़ने की दिशा में एक अहम पहल देखने को मिली। फिलीपींस से आए वैज्ञानिकों ने नेवरगांवकला पहुंचकर किसानों के खेतों में चल रहे प्रयोगों का जायजा लिया और फसल प्रबंधन पर सीधे संवाद किया। इस दौरान वैज्ञानिकों ने आरसीटी (Randomized Controlled Trials) और एफएलडी (Front Line Demonstration) के तहत किए जा रहे प्रयोगों की मौजूदा स्थिति देखी। टीम ने खेतों में फसल की स्थिति का जायजा लेने के साथ किसानों से सीधे बातचीत भी की।
किसानों से जाना फसल का अनुभव
निरीक्षण के दौरान वैज्ञानिकों ने किसानों से खेती में अपनाई जा रही तकनीकों और अब तक मिले परिणामों के बारे में जानकारी ली। किसानों ने फसल प्रबंधन के दौरान सामने आ रही समस्याओं और अपने अनुभव वैज्ञानिकों के साथ साझा किए। इसके आधार पर टीम ने खेत की परिस्थितियों के अनुसार जरूरी सुझाव भी दिए। इस दौरान खेती में वैज्ञानिक तकनीकों के इस्तेमाल और उनके व्यावहारिक परिणामों पर भी चर्चा हुई।
जैव उर्वरकों के इस्तेमाल पर जोर
वैज्ञानिकों ने किसानों को जैव उर्वरकों (Biofertilizers) के उचित इस्तेमाल की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सही तरीके से जैव उर्वरकों का उपयोग करने से मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा इससे पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने और फसल की उत्पादकता में सुधार की संभावना रहती है। किसानों को जैव उर्वरकों की सही मात्रा, इस्तेमाल का उचित समय और फसल के अनुसार इनके प्रयोग के बारे में भी मार्गदर्शन दिया गया।
फिलीपींस के वैज्ञानिकों ने किया निरीक्षण
खेतों के निरीक्षण के दौरान फिलीपींस स्थित अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (IRRI) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शलभ दीक्षित मौजूद रहे। उनके साथ आईआरआरआई की संचार टीम की मर्टिल मेम और जबलपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रामाकृष्णन भी शामिल रहे। वैज्ञानिकों ने परियोजना के तहत किए जा रहे प्रयोगों को करीब से देखा और किसानों से उनके व्यावहारिक अनुभव समझे।
खेतों तक तकनीक पहुंचाना परियोजना का उद्देश्य
इस परियोजना का उद्देश्य वैज्ञानिक तकनीकों को खेतों में प्रदर्शित कर उनके परिणामों के माध्यम से किसानों को बेहतर धान उत्पादन पद्धतियों से जोड़ना है।
आरसीटी और एफएलडी जैसे प्रयोगों से खेती की तकनीकों का व्यावहारिक मूल्यांकन करने के साथ किसानों को नई पद्धतियों से परिचित कराने पर जोर दिया जा रहा है।
वैज्ञानिकों का किसानों से सीधा संवाद इस प्रक्रिया को और उपयोगी बना रहा है, क्योंकि इससे खेतों में आने वाली वास्तविक समस्याओं के आधार पर फसल प्रबंधन की सलाह दी जा सकती है।