Live-in Relationship पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, जानिए कब लगेगी 498A

बिना शादी किए साथ रहने वाले जोड़ों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक दूरगामी फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि कुछ खास परिस्थितियों में शादी जैसे लिव-इन रिलेशनशिप में महिला के साथ क्रूरता होने पर पुरुष पार्टनर और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ IPC की धारा 498A के तहत कार्रवाई हो सकती है। लेकिन कोर्ट ने यह सुरक्षा हर लिव-इन रिलेशनशिप को नहीं दी है।

3 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने 3 अगस्त 2026 को यह फैसला दिया। मामला कर्नाटक से सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।

मामले में मुख्य कानूनी सवाल यह था कि यदि किसी पुरुष और महिला के बीच वैधानिक विवाह साबित नहीं है, लेकिन उनका रिश्ता शादी जैसा है, तो क्या महिला के साथ क्रूरता के आरोप में पुरुष के खिलाफ IPC की धारा 498A लग सकती है?

सुप्रीम कोर्ट ने इसका जवाब कुछ शर्तों के साथ हां में दिया।

क्या था पूरा मामला

यह मामला Lokesh B.H. & Ors. v. State of Karnataka & Anr. से संबंधित है। शिकायतकर्ता महिला का दावा था कि उसका आरोपी के साथ हिंदू रीति-रिवाजों से विवाह हुआ था और इसके बाद उसे कथित रूप से क्रूरता तथा दहेज उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।

दूसरी तरफ आरोपी ने वैध विवाह होने से इनकार किया और तर्क दिया कि जब कानूनी रूप से पति-पत्नी का संबंध ही नहीं था तो IPC की धारा 498A नहीं लगाई जा सकती।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने उठाया था बड़ा कानूनी सवाल

यह विवाद अचानक अगस्त में सामने नहीं आया। 13 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए बाकायदा यह सवाल विचार के लिए तय किया था कि live-in relationship या relationship in the nature of marriage में रहने वाला पुरुष IPC 498A अथवा BNS की corresponding provision के तहत prosecuted हो सकता है या नहीं।

मामले की अहमियत को देखते हुए कोर्ट ने केंद्र सरकार के कानून एवं न्याय मंत्रालय को भी पक्षकार बनाया था।

हर Live-in Relationship में नहीं लगेगी 498A

फैसले का यह सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।

सुप्रीम कोर्ट ने Live-in Relationship और Relationship in the Nature of Marriage में अंतर किया है।

सामान्य live-in relationship काफी व्यापक श्रेणी है। इनमें से कुछ रिश्ते ही इतने स्थायी और विवाह जैसे होते हैं कि उन्हें “relationship in the nature of marriage” माना जा सकता है।

अदालत ने साफ किया कि हर लिव-इन रिलेशनशिप में 498A नहीं लगाई जा सकती।

कैसे तय होगा रिश्ता ‘शादी जैसा’ था?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों D. Velusamy v. D. Patchaiammal और Indra Sarma v. V.K.V. Sarma में विकसित सिद्धांतों का उल्लेख किया।

ऐसे संबंध की पहचान करते समय कई परिस्थितियां देखी जा सकती हैं—जैसे संबंध कितने समय तक चला, दोनों साझा घर में रहते थे या नहीं, आर्थिक संसाधन साझा थे या नहीं, घरेलू जिम्मेदारियां कैसी थीं, बच्चे हैं या नहीं, समाज के सामने दोनों खुद को किस तरह प्रस्तुत करते थे और उनका साझा आचरण क्या था।

ये कोई ऐसी चेकलिस्ट नहीं है जिसमें हर बॉक्स टिक होना अनिवार्य हो। कोर्ट ने इन्हें परिस्थितियों को समझने के illustrative indicators माना है।

सिर्फ साथ रहना काफी नहीं, शादी का इरादा भी जरूरी

यहीं सुप्रीम कोर्ट ने 498A के इस्तेमाल के लिए महत्वपूर्ण अतिरिक्त शर्त लगाई।

अदालत ने कहा कि संबंध सिर्फ ‘शादी जैसा’ होना पर्याप्त नहीं है। विवाह करने का इरादा (intent to marry) भी उस रिश्ते का आंतरिक हिस्सा होना चाहिए।

क्योंकि 498A एक आपराधिक प्रावधान है, इसलिए कोर्ट ने इसकी सीमा को Domestic Violence Act के मुकाबले अधिक संकीर्ण रखा है।

इस शुरुआती तथ्य को स्थापित करने का दायित्व महिला पार्टनर पर होगा कि रिश्ते में शादी करने का वास्तविक इरादा मौजूद था।

Weekend Relationship या One-Night Stand इसके दायरे में नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने पुराने न्यायिक सिद्धांतों को दोहराते हुए स्पष्ट किया कि केवल कभी-कभी साथ रहना, वीकेंड साथ बिताना या one-night stand किसी रिश्ते को अपने आप ‘relationship in the nature of marriage’ नहीं बना देता।

रिश्ते की वास्तविक प्रकृति का निर्धारण उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर होगा।

दोनों का वयस्क और सहमति से रिश्ते में होना जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक और सीमा तय की है।

498A के इस विस्तारित संरक्षण के लिए संबंधित live-in relationship दो consenting adults यानी सहमति से साथ रहने वाले दो वयस्कों के बीच होना चाहिए।

कोर्ट ने Article 14 का क्यों किया जिक्र

सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद को केवल 498A की तकनीकी व्याख्या तक सीमित नहीं रखा। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 यानी समानता के अधिकार से भी जोड़कर देखा।

कोर्ट का तर्क था कि घरेलू क्रूरता से सुरक्षा देने के उद्देश्य से देखें तो वैधानिक रूप से विवाहित महिला और विवाह जैसे संबंध में रहने वाली महिला के बीच केवल रिश्ते के औपचारिक लेबल के आधार पर फर्क करने का तार्किक आधार नहीं है।

अदालत ने माना कि ऐसी स्थिति में भेदभाव 498A के उद्देश्य से तार्किक संबंध नहीं रखता और Article 14 के विपरीत होगा।

Domestic Violence Act था, फिर 498A की जरूरत क्यों

केंद्र की ओर से यह तर्क भी सामने आया कि ‘relationship in the nature of marriage’ में रहने वाली महिलाओं को Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 के तहत पहले से संरक्षण प्राप्त है।

सुप्रीम कोर्ट इससे पूरी तरह सहमत नहीं हुआ।

कोर्ट ने कहा कि DV Act मुख्य रूप से civil remedies देता है—जैसे protection, residence, monetary relief, custody और compensation। दूसरी तरफ IPC 498A आपराधिक दायित्व तय करती है।

इसलिए केवल DV Act का संरक्षण मौजूद होना 498A की आपराधिक सुरक्षा को अनावश्यक नहीं बनाता।

क्या शिकायत होते ही पुरुष की गिरफ्तारी होगी

नहीं… सुप्रीम कोर्ट ने 498A के दुरुपयोग को लेकर पूर्व में सामने आई चिंताओं को ध्यान में रखते हुए गिरफ्तारी संबंधी safeguards को भी मजबूत तरीके से दोहराया।

अदालत ने कहा कि Arnesh Kumar v. State of Bihar (2014) में तय गिरफ्तारी संबंधी सुरक्षा उपाय ऐसे मामलों में भी पूरी तरह लागू होंगे।

इसका अर्थ यह नहीं है कि FIR होते ही पुरुष पार्टनर या उसके रिश्तेदारों की स्वतः गिरफ्तारी हो जाएगी। पुलिस को गिरफ्तारी से संबंधित निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और safeguards का पालन करना होगा।

क्या फैसला दूसरे कानूनों पर भी अपने आप लागू होगा

नहीं… सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि इस फैसले में दी गई विस्तारित व्याख्या IPC की धारा 498A तक सीमित रहेगी। इसे अपने आप दूसरे आपराधिक या वैवाहिक कानूनों पर लागू नहीं माना जा सकता।

IPC खत्म हो चुकी है, फिर 498A की चर्चा क्यों

IPC की जगह 1 जुलाई 2024 से Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS) लागू हो चुकी है। यह मामला पुराने घटनाक्रम और IPC के तहत दर्ज कार्यवाही से संबंधित है, इसलिए फैसले में Section 498A IPC केंद्रीय मुद्दा है।

फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने मुद्दा तय करते समय 498A के साथ BNS में corresponding provision का सवाल भी स्पष्ट रूप से दर्ज किया था।

आसान भाषा में समझें- फैसले के बाद क्या बदला

मान लीजिए दो वयस्क लंबे समय से साथ रह रहे हैं। उनका साझा घर है, उनका व्यवहार पति-पत्नी जैसा है और परिस्थितियों तथा साक्ष्यों से यह भी साबित होता है कि दोनों का आगे विवाह करने का वास्तविक इरादा था।

यदि ऐसे संबंध में महिला कथित रूप से उस स्तर की क्रूरता का सामना करती है जो 498A की कानूनी परिभाषा में आती है, तो पुरुष यह कहकर अपने आप मुकदमे से नहीं बच सकता कि ‘हमारी कानूनी शादी ही नहीं हुई थी।’

लेकिन केवल boyfriend-girlfriend होना, कुछ समय साथ रहना या casual relationship अपने आप 498A लगाने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा केस में क्या किया

शीर्ष अदालत ने मौजूदा मामले में आपराधिक कार्यवाही को खत्म करने से इनकार किया। शिकायत में दहेज उत्पीड़न, शारीरिक क्रूरता और burn injuries जैसे आरोप थे। अदालत ने माना कि शुरुआती स्तर पर आरोप cognizable offences का मामला बनाते हैं और कार्यवाही रद्द करने के स्थापित मानकों में हस्तक्षेप का आधार नहीं बनता।

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