प्रयागराज में फर्जी LLB डिग्री का मामला, 62 वकीलों पर FIR

प्रयागराज। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के आधार पर वकालत में प्रवेश करने के आरोपों ने कानूनी व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश की ओर से उपलब्ध कराए गए मामलों में पुलिस ने कार्रवाई शुरू कर दी है। सिविल लाइंस पुलिस के मुताबिक, 10 अगस्त की रात तक 62 अधिवक्ताओं के खिलाफ नामजद FIR दर्ज की जा चुकी थी। बार काउंसिल की ओर से कुल 105 अधिवक्ताओं के खिलाफ तहरीर दी गई है। इन लोगों के शैक्षणिक दस्तावेजों के सत्यापन में कथित तौर पर फर्जी डिग्री और अंकपत्र सामने आए हैं।

105 अधिवक्ताओं के दस्तावेजों में मिली गड़बड़ी

मामले की शुरुआत अधिवक्ताओं के रिकॉर्ड और Certificate of Practice यानी COP Verification से हुई। बार काउंसिल के रिकॉर्ड के अनुसार, सत्यापन प्रक्रिया में 105 अधिवक्ताओं के enrollment को फर्जी शैक्षणिक योग्यता से जुड़ा पाया गया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष रखे गए रिकॉर्ड के अनुसार, उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में करीब 5.14 लाख अधिवक्ता enrolled थे और लगभग 2.49 लाख को Certificate of Practice जारी किया गया था। इसी सत्यापन प्रक्रिया में 105 enrollment को फर्जी पाया गया।

इन मामलों को सामने आने के बाद हाईकोर्ट ने संबंधित अधिवक्ताओं के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बाद बार काउंसिल ने पुलिस को मामलों की सूची और तहरीर उपलब्ध कराई।

62 पर FIR, बाकी मामलों में भी कार्रवाई

सिविल लाइंस पुलिस के अनुसार, प्रत्येक अधिवक्ता के मामले में अलग-अलग FIR दर्ज की जा रही है। पुलिस का कहना है कि सभी मामलों की प्रकृति और दस्तावेज अलग हैं, इसलिए प्रत्येक प्रकरण की अलग जांच होगी।

11 अगस्त को उपलब्ध ताजा रिपोर्टों के अनुसार, पहले 39 FIR की जानकारी सामने आई थी, लेकिन बाद में संख्या बढ़कर 62 हो गई। बाकी मामलों में भी FIR दर्ज करने की प्रक्रिया जारी है। इससे साफ है कि यह कार्रवाई अभी शुरुआती चरण में है और आने वाले दिनों में FIR की संख्या बढ़ सकती है।

सिर्फ LLB ही नहीं, दूसरी डिग्रियां भी सवालों के घेरे में

हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक 105 मामलों में फर्जी शैक्षणिक योग्यता की कई श्रेणियां सामने आईं। इनमें करीब 65 मामलों में फर्जी LL.B. डिग्री, 28 मामलों में फर्जी Graduation डिग्री और करीब 5 मामलों में फर्जी Integrated B.A.LL.B. डिग्री का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा Intermediate और High School प्रमाणपत्रों से जुड़े मामले भी सामने आए हैं।

यानी मामला सिर्फ LLB की मार्कशीट तक सीमित नहीं है। कुछ मामलों में कानून की पढ़ाई में प्रवेश के लिए जरूरी पिछली शैक्षणिक योग्यता पर भी सवाल उठे हैं।

प्रयागराज में सबसे ज्यादा मामले

इस पूरे मामले में प्रयागराज का आंकड़ा भी बेहद महत्वपूर्ण है। हाईकोर्ट के समक्ष उपलब्ध जिला-वार आंकड़ों के मुताबिक, 105 में करीब 49 मामले प्रयागराज से जुड़े पाए गए।

इसके बाद गौतमबुद्धनगर, बलिया और लखनऊ समेत अन्य जिलों के मामले सामने आए। इसका अर्थ है कि फर्जी दस्तावेजों से जुड़े मामले केवल प्रयागराज तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में फैले हुए हैं।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के नाम का भी इस्तेमाल

जांच में कथित तौर पर कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के नाम से जुड़े फर्जी या tampered documents सामने आए। इनमें इलाहाबाद विश्वविद्यालय का नाम सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए गए संस्थानों में बताया गया है।

Times of India की रिपोर्ट के अनुसार, एक मामले में चैल, कौशाम्बी निवासी अमर सिंह की LLB डिग्री का विश्वविद्यालय से सत्यापन कराया गया था, जिसे संबंधित विश्वविद्यालय ने फर्जी बताया। उनके खिलाफ BNS की विभिन्न धाराओं में FIR दर्ज की गई।

यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब जांच केवल संबंधित अधिवक्ताओं तक सीमित नहीं रहेगी। पुलिस को यह भी पता लगाना होगा कि फर्जी दस्तावेज तैयार करने और उपलब्ध कराने का नेटवर्क कहां तक फैला हुआ था।

हाईकोर्ट ने सत्यापन प्रक्रिया पर भी उठाए सवाल

मामले की गंभीरता इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिर्फ 105 मामलों पर कार्रवाई का निर्देश ही नहीं दिया, बल्कि सत्यापन की पूरी प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए।

कोर्ट के समक्ष रखे गए आंकड़ों में 105 फर्जी qualifications सामने आने के बाद अदालत ने इस संख्या को लेकर गंभीर चिंता जताई। रिपोर्टों के मुताबिक हाईकोर्ट ने संकेत दिया कि करीब 5 लाख से अधिक enrolled advocates वाले राज्य में केवल 105 मामलों की पहचान व्यापक समस्या की पूरी तस्वीर नहीं हो सकती। अदालत ने verification exercise को पर्याप्त रूप से स्वतंत्र और व्यापक बनाने की जरूरत पर जोर दिया है।

1991 से 2023 तक के enrollment भी जांच में

हाईकोर्ट के समक्ष सामने आए आंकड़ों में फर्जी qualifications से जुड़े enrollment अलग-अलग वर्षों के बताए गए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक कुछ मामले 1991 और 1992 जैसे पुराने enrollment से भी जुड़े हैं, जबकि सूची में बाद के वर्षों के मामले भी शामिल हैं।

इसका मतलब यह है कि यदि दस्तावेजों में फर्जीवाड़े की पुष्टि होती है तो मामला केवल हाल में वकालत शुरू करने वालों तक सीमित नहीं होगा। कई पुराने enrollment भी जांच के दायरे में आ सकते हैं।

अब पुलिस की जांच का अगला चरण क्या होगा

FIR दर्ज होने के बाद अब पुलिस प्रत्येक मामले में दस्तावेजों की जांच करेगी। इसमें संबंधित विश्वविद्यालय या शैक्षणिक बोर्ड से डिग्री और अंकपत्र का सत्यापन, enrollment records की पड़ताल और यह पता लगाना शामिल होगा कि दस्तावेज किस तरह तैयार या इस्तेमाल किए गए।

जांच में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित व्यक्ति को दस्तावेज के फर्जी होने की जानकारी थी या नहीं। आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए पुलिस को प्रत्येक मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ना होगा।

न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा बड़ा सवाल

कानून की डिग्री और वैध enrollment किसी भी अधिवक्ता के लिए बुनियादी आवश्यकता है। यदि कोई व्यक्ति फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के आधार पर इस पेशे में प्रवेश करता है, तो सवाल केवल उसके व्यक्तिगत कृत्य तक सीमित नहीं रहता।

ऐसे मामलों का असर अदालत में उसके द्वारा किए गए पेशेवर कार्यों और न्याय व्यवस्था पर लोगों के भरोसे तक पहुंच सकता है। यही वजह है कि हाईकोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए FIR और verification प्रक्रिया को लेकर सख्त रुख अपनाया है।

फिलहाल 105 अधिवक्ताओं की सूची में से 62 के खिलाफ FIR दर्ज हो चुकी है, जबकि बाकी मामलों में पुलिस कार्रवाई आगे बढ़ रही है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि इनमें से कितने मामलों में आरोप सही साबित होते हैं और फर्जी दस्तावेज तैयार करने या इस्तेमाल करने के पीछे कौन लोग शामिल थे।

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