जब विक्रम-1 ने भरी उड़ान, कंट्रोल रूम में था सतना का युवा इंजीनियर

मध्य प्रदेश के सतना जिले के लिए गर्व की खबर है। जिले के कोठरा (जैतवारा) निवासी युवा इंजीनियर रतेन्द्र सिंह ने भारत के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 के सफल मिशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर पूरे विंध्य का नाम रोशन किया है। विक्रम-1 मिशन की सफलता केवल भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र की उपलब्धि नहीं, बल्कि सतना जैसे छोटे शहरों के युवाओं के लिए भी प्रेरणा है। रतेन्द्र सिंह की सफलता यह साबित करती है कि प्रतिभा और मेहनत के दम पर वैश्विक स्तर की उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं।

बढ़ाया जिले का मान

सतना जिले के कोठरा (जैतवारा) निवासी युवा इंजीनियर रतेन्द्र सिंह ने भारत के अंतरिक्ष इतिहास की एक बड़ी उपलब्धि में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हाल ही में सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से लॉन्च किए गए निजी क्षेत्र के पहले ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 के मिशन में वे इंजीनियरिंग टीम का हिस्सा रहे। रतेन्द्र वर्तमान में स्काईरूट एयरोस्पेस, हैदराबाद में इंजीनियर के रूप में कार्यरत हैं। उनके पिता पुष्पेंद्र सिंह भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हैं, जबकि माता रीतू सिंह गृहिणी हैं। उनकी बहन शिल्पा गुरुग्राम में आईटी इंजीनियर हैं।

भारत के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट का हिस्सा बने

रतेन्द्र सिंह के अनुसार, स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित विक्रम-1 भारत का पहला निजी कक्षीय (ऑर्बिटल) रॉकेट है। इसका सफल प्रक्षेपण 18 जुलाई को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से किया गया। यह निजी क्षेत्र का पहला ऐसा पूर्ण ऑर्बिटल रॉकेट है, जिसे उपग्रहों को निर्धारित कक्षा में स्थापित करने की क्षमता के साथ विकसित किया गया है। इससे पहले कंपनी 18 नवंबर 2022 को देश का पहला निजी सब-ऑर्बिटल टेस्ट रॉकेट भी सफलतापूर्वक लॉन्च कर चुकी है।

भारत बना दुनिया का तीसरा देश

रतेन्द्र ने बताया कि इस ऐतिहासिक मिशन के साथ भारत अमेरिका और चीन के बाद निजी क्षेत्र से ऑर्बिटल लॉन्च करने वाला दुनिया का तीसरा देश बन गया है। उन्होंने बताया कि मिशन की सफलता के लिए वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की टीम ने श्रीहरिकोटा में लगभग एक महीने तक लगातार प्रतिदिन 15-15 घंटे काम किया। लंबे समय तक चले कठिन परिश्रम और तकनीकी परीक्षणों के बाद मिशन को सफलता मिली।

आर्मी स्कूल से लेकर एयरोस्पेस तक का सफर

रतेन्द्र सिंह ने पहली से बारहवीं तक की पढ़ाई विभिन्न आर्मी स्कूलों से पूरी की। वर्ष 2015 में उन्होंने उत्तराखंड टेक्निकल यूनिवर्सिटी (UTU) से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। इसके बाद उन्होंने ग्रेजुएट एप्टीट्यूड टेस्ट इन इंजीनियरिंग (GATE) में सफलता हासिल की और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी (IIST), तिरुवनंतपुरम से एमटेक की डिग्री प्राप्त की। वर्तमान में वे भारत के निजी अंतरिक्ष कार्यक्रम को आगे बढ़ाने वाली प्रमुख टीम का हिस्सा हैं।

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