चित्रकूट के खोडरी में फिर दिखा बाघ, ग्रामीणों में दहशत; इलाके में 30 से ज्यादा टाइगर की मौजूदगी

सतना। चित्रकूट विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पंचायत खोडरी के बरहा डेगरहट रोड पर बाघ दिखाई देने की सूचना के बाद पूरे इलाके में दहशत का माहौल है। ग्रामीणों ने सड़क के आसपास बाघ की मौजूदगी देखे जाने की जानकारी दी है। घटना के बाद लोगों ने खेतों और जंगल की ओर अकेले जाने से परहेज शुरू कर दिया है।

धारकुंडी के बाद फिर सामने आया बाघ

कुछ दिन पहले ही मझगवां वन परिक्षेत्र के धारकुंडी आश्रम मार्ग पर एक वयस्क बाघ सड़क पार करता दिखाई दिया था। उस दौरान कुछ देर के लिए यातायात भी थम गया था और वहां मौजूद लोगों ने वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा किया था। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाएं बताती हैं कि चित्रकूट और मझगवां का वन क्षेत्र अब बाघों की सक्रिय आवाजाही वाला क्षेत्र बन चुका है।

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क्षेत्र में 30 से अधिक बाघों की मौजूदगी का दावा

स्थानीय लोगों और वन क्षेत्र से जुड़े जानकारों के अनुसार चित्रकूट, मझगवां, सरभंगा, धारकुंडी और आसपास के जंगलों में अब 30 से अधिक बाघों का मूवमेंट देखा जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में बाघों की संख्या बढ़ने से वन्यजीव संरक्षण की सफलता तो दिख रही है, लेकिन आबादी के करीब उनकी आवाजाही नई चुनौती भी बन रही है। पूर्व में सरभंगा क्षेत्र में भी लगातार टाइगर मूवमेंट दर्ज होने की जानकारी सामने आती रही है।

ग्रामीणों में दहशत, सतर्क रहने की सलाह

खोडरी और आसपास के गांवों के लोगों का कहना है कि बाघ की मौजूदगी के कारण शाम ढलने के बाद खेतों और जंगल की ओर जाने में डर का माहौल है। ग्रामीणों ने वन विभाग से गश्त बढ़ाने और संवेदनशील इलाकों में चेतावनी बोर्ड लगाने की मांग की है।

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विशेषज्ञों की सलाह- बाघ दिखे तो न करें पीछा

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार बाघ सामान्य परिस्थितियों में इंसानों से दूरी बनाए रखना पसंद करता है। यदि कहीं बाघ दिखाई दे तो उसके पास जाने, फोटो या वीडियो बनाने अथवा उसे घेरने का प्रयास नहीं करना चाहिए। तुरंत वन विभाग को सूचना देना सबसे सुरक्षित कदम माना जाता है।

बाघों की बढ़ती संख्या संरक्षण की सफलता, लेकिन चुनौती भी

चित्रकूट और सतना का विंध्य वन क्षेत्र लंबे समय से बाघों के प्राकृतिक आवास के रूप में जाना जाता है। वन क्षेत्रों के बेहतर संरक्षण और पर्याप्त शिकार आधार के कारण यहां बाघों की संख्या बढ़ी है। हालांकि, जंगल से सटे गांवों में उनकी आवाजाही मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका भी बढ़ा रही है।

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