सीधी के संजय टाइगर रिजर्व में बाघों की बढ़ती संख्या संरक्षण की बड़ी सफलता है। लेकिन इसी सफलता ने अब एक नई चुनौती भी खड़ी कर दी है। बाघ बढ़े तो उनका इलाका भी चाहिए। दूसरी ओर, रिजर्व से लगे गांवों का विस्थापन अपेक्षित गति से पूरा नहीं हो सका है। ऐसे में सवाल सिर्फ बाघों की संख्या बढ़ाने का नहीं है। अब चुनौती यह है कि बढ़ते बाघों के लिए पर्याप्त और सुरक्षित जंगल कैसे उपलब्ध कराया जाए।
छह साल में बाघों की संख्या में बड़ा उछाल
संजय टाइगर रिजर्व में पिछले कुछ वर्षों में बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उपलब्ध विभागीय आंकड़ों के मुताबिक 2018 की गणना में यहां करीब छह बाघ दर्ज किए गए थे। इसके बाद 2023 की गणना में संख्या बढ़कर करीब 20 बताई गई। अब विभागीय नवीनतम अनुमान में रिजर्व में करीब 44 बाघ होने की बात सामने आई है। यानी छह साल के भीतर बाघों की संख्या सात गुना से अधिक बढ़ी है।
यह आंकड़ा संजय टाइगर रिजर्व के लिए बड़ी उपलब्धि है। इसका मतलब है कि यहां का जंगल बाघों के लिए अनुकूल है। शिकार प्रजातियों की उपलब्धता, पानी और प्राकृतिक आवास ने बाघों के संरक्षण को मजबूती दी है। संजय टाइगर रिजर्व की आधिकारिक वेबसाइट भी इसके विविध प्राकृतिक आवास, जलस्रोतों और घने वन क्षेत्र को इसकी जैव विविधता की प्रमुख वजहों में गिनाती है।
बाघ बढ़े तो अब जंगल की जगह भी बढ़ानी होगी
बाघों की संख्या बढ़ना निश्चित रूप से अच्छी खबर है। लेकिन जंगल में हर बाघ का अपना क्षेत्र भी होता है। जब एक ही क्षेत्र में बाघों की संख्या बढ़ती है तो उनके बीच क्षेत्र को लेकर संघर्ष की स्थिति बन सकती है। इसके अलावा कुछ बाघ भोजन और क्षेत्र की तलाश में जंगल से बाहर भी निकल सकते हैं।
संजय टाइगर रिजर्व में ऐसी चुनौती इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि रिजर्व से लगे कई गांवों का पूर्ण विस्थापन अभी बाकी है। यही वजह है कि संरक्षण की अगली लड़ाई अब सिर्फ बाघों की निगरानी तक सीमित नहीं रहेगी। बाघों के लिए पर्याप्त प्राकृतिक रहवास तैयार करना भी उतना ही जरूरी होगा।
54 गांवों के विस्थापन का लक्ष्य, 19 ही पूरी तरह खाली हुए
संजय टाइगर रिजर्व में कुल 54 गांवों के विस्थापन का प्रस्ताव है। अब तक इनमें से सिर्फ 19 गांव पूरी तरह विस्थापित हो सके हैं। वहीं 12 गांवों का आंशिक पुनर्वास हुआ है। इन गांवों से जुड़े 1538 हितग्राहियों में से 691 का पुनर्वास पूरा होने की जानकारी दी गई है।
इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में परिवारों का पुनर्वास अभी बाकी है। अधिकारियों के अनुसार, चिन्हित गांवों का पूर्ण विस्थापन होने के बाद बाघों के लिए प्राकृतिक आवास का दायरा बढ़ाया जा सकेगा। यही कारण है कि आने वाले समय में पुनर्वास प्रक्रिया की गति संजय टाइगर रिजर्व के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
कुसमी बना बाघों का नया ठिकाना
बाघों की बढ़ती संख्या के साथ उनका फैलाव भी नए क्षेत्रों में दिखाई देने लगा है। पहले संजय टाइगर रिजर्व की दुबरी, व्योहारी और पोंडी रेंज बाघों की प्रमुख गतिविधियों के लिए जानी जाती थीं। अब कुसमी रेंज में भी बाघों की सक्रियता बढ़ रही है।
विभाग ने कुसमी रेंज को नए बाघ आवास क्षेत्र के रूप में विकसित करने की दिशा में काम शुरू किया है। यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बाघों को एक ही क्षेत्र तक सीमित रखना संभव नहीं है। पर्याप्त जगह मिलने पर उनका प्राकृतिक फैलाव संरक्षण के लिए बेहतर स्थिति पैदा कर सकता है।
जंगल में बढ़ते बाघों के साथ बढ़ रहा पर्यटन
संजय टाइगर रिजर्व में बाघों की बढ़ती संख्या का असर पर्यटन पर भी दिखाई दे रहा है। रिजर्व के आसपास ठहरने और पर्यटन से जुड़ी सुविधाओं का विस्तार हुआ है। एमपी टूरिज्म के परसिली रिसॉर्ट के अलावा निजी क्षेत्र में भी कई ठहराव केंद्र और होम स्टे संचालित हैं।
बकवा गांव में भी होम स्टे शुरू किया गया है। पर्यटकों की संख्या में भी बड़ा बदलाव आया है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2018-19 में सिर्फ 1333 पर्यटक संजय टाइगर रिजर्व पहुंचे थे। इसके मुकाबले 1 अक्टूबर 2025 से 30 जून 2026 तक 12,653 पर्यटक यहां पहुंच चुके हैं। यानी बाघों की बढ़ती मौजूदगी ने संजय टाइगर रिजर्व को पर्यटन के नक्शे पर भी तेजी से आगे बढ़ाया है।
71.50 लाख तक पहुंचा पर्यटन से राजस्व
पर्यटकों की संख्या बढ़ने के साथ राजस्व में भी इजाफा हुआ है। उपलब्ध विभागीय आंकड़ों के अनुसार, 1 अक्टूबर 2025 से 30 जून 2026 के बीच पर्यटन गतिविधियों से करीब 71.50 लाख रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ।
यह संजय टाइगर रिजर्व के लिए आर्थिक रूप से भी सकारात्मक संकेत है। हालांकि पर्यटन बढ़ने के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ती है। ज्यादा पर्यटक का मतलब जंगल में ज्यादा मानवीय गतिविधियां भी हैं। इसलिए जरूरी होगा कि पर्यटन का विस्तार वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार और पर्यावरण की सीमा को ध्यान में रखकर किया जाए।
संरक्षण की सफलता अब नए दौर में पहुंची
संजय टाइगर रिजर्व की कहानी पिछले कुछ वर्षों में काफी बदली है। एक समय यहां बाघों की संख्या बेहद कम थी। अब करीब 44 बाघों का अनुमान सामने आ रहा है। यह बदलाव संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण है। लेकिन बाघों की संख्या बढ़ने के साथ संरक्षण की प्राथमिकताएं भी बदलती हैं।
अब निगरानी के साथ आवास प्रबंधन, गांवों का पुनर्वास, वन्यजीव कॉरिडोर, मानव-बाघ संघर्ष की रोकथाम और पर्यटन प्रबंधन पर समान रूप से ध्यान देना होगा।
संजय टाइगर रिजर्व खुद एक बड़े वन्यजीव परिदृश्य का हिस्सा है। इसकी आधिकारिक जानकारी इसे बांधवगढ़-संजय-गुरु घासीदास-पलामू लैंडस्केप से जोड़ती है और कॉरिडोर कनेक्टिविटी को महत्वपूर्ण बताती है।
बाघ बढ़े हैं, अब जंगल को उनके लिए बचाना होगा
संजय टाइगर रिजर्व के सामने आज की तस्वीर दो हिस्सों में दिखाई देती है। एक तरफ बाघों की संख्या बढ़ रही है। दूसरी तरफ उनके लिए पर्याप्त प्राकृतिक क्षेत्र उपलब्ध कराने की चुनौती है।
19 गांवों का पूर्ण विस्थापन एक उपलब्धि है। लेकिन 54 गांवों के प्रस्तावित विस्थापन में अभी काफी काम बाकी है। यदि पुनर्वास प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से पूरी होती है और नए आवास क्षेत्र विकसित किए जाते हैं, तो संजय टाइगर रिजर्व बाघ संरक्षण की एक और बड़ी सफलता बन सकता है।
‘संजय टाइगर रिजर्व के संयुक्त संचालक राजेश कन्ना टी के अनुसार, रिजर्व का प्राकृतिक वातावरण बाघों के रहवास और वृद्धि के लिए अनुकूल है। उनका कहना है कि इसी वजह से यहां बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यदि चिन्हित गांवों का पूर्ण विस्थापन समयबद्ध तरीके से हो जाए तो बाघों के लिए पर्याप्त प्राकृतिक आवास उपलब्ध कराया जा सकेगा।’